nazmKuch Alfaaz

बाद-ओ-बाराँ से उलझता ख़ंदा-ज़न गिर्दाब पर इक जज़ीरा तैरता जाता है सतह-ए-आब पर गुम कई सदियों का उस में जज़्बा-ए-तहक़ीक़ है ये जज़ीरा आदमी के ज़ेहन की तख़्लीक़ है जा रहा है हर घड़ी मौजों से टकराता हुआ अपने ही अंदाज़ में अपना रजज़ गाता हुआ बहर की अमवाज पर बहते हुए शहर-ए-जमील हर क़दम तेरा लिए है तेरी अज़्मत की दलील आँधियों का ज़ोर, मौजों की रवानी तुझ में है इर्तिक़ा-ए-ज़ेहन-ए-इंसाँ की कहानी तुझ में है हर भँवर में और हर तूफ़ान में साहिल है तू सीना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा का धड़कता दिल है तू तो तजल्ली ही तजल्ली है अँधेरी रात में रौशनी का है मनारा आलम-ए-ज़ुल्मात में रात आई जाग उठा इंसाँ का ज़ौक़-ए-बे-बिसात आख़िरी इस का ठिकाना मर्द ओ ज़न का इख़्तिलात किस क़दर अर्ज़ां हुए तहज़ीब के लमआत-ए-नूर अल्लाह अल्लाह चार जानिब रौशनी का ये वफ़ूर इस तरह से मैं ने कब देखी थी मय-ख़ाने में धूम औरतों मर्दों का लड़कों लड़कियों का ये हुजूम सब नशे में मस्त हैं लेकिन हैं कितने बा-ख़बर फिर रहे हैं सब के सब इक दूसरे को थाम कर अहमरीं साग़र, लब-ए-ल'अलीं, निगाहें मय-फ़रोश हर तरफ़ है एक मस्ती, हर तरफ़ है इक ख़रोश इस जगह इदराक से बेगाना कोई भी नहीं सब हैं फ़रज़ाने यहाँ दीवाना कोई भी नहीं अक़्ल की इस बज़्म में दीवानगी का काम क्या ढूँढ़ता है तू यहाँ आ कर दिल-ए-नाकाम क्या इतनी आगाही किसी को हो ये मोहलत ही नहीं किस की बाहें किस की गर्दन में हमाइल हो गईं आ के आग़ोश-ए-हवस में ख़ुद यहाँ गिरता है हुस्न किस क़दर कच्चे सहारे ढूँढ़ता फिरता है हुस्न जिस से ख़ीरा तेरी आँखें हैं चमक यूरोप की है देख ऐ 'आज़ाद'! ये पहली झलक यूरोप की है

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"वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं" वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं जिस भी घर में जिस भी दिल में हो ख़ुश हो उस को ख़ुश भी न देखूँ ऐसी सिफ़ात नहीं लेकिन दिल से उस को भुलाने से पहले यादों का ये जज़ीरा तोड़ने से पहले मैं कुछ देर सलीक़े से जाँ रो तो लूँ दिल पे लगा जो रंग मलाल का धो तो लूँ अब से रोग नहीं ऐ दिल कुछ जोग नहीं यार के जाने का ऐ दिल कुछ सोग नहीं एक ही शख़्स नहीं दुनिया में मतवाले मंज़िल और भी है दूसरे मंज़िल को देख एक किनारा छूट गया तो क्या ही हुआ साहिल और भी है दूसरे साहिल को देख तेरे साथ जो औरों को भी रुला ही दे अब ऐसी हसरत का दीप बुझा ही दे दर्द-नुमा दिल छोड़ आ उस के आंगन में ऐ ना-शाद मुसाफ़िर झूम आ सावन में अब से रोग नहीं ऐ दिल कुछ जोग नहीं यार के जाने का ऐ दिल कुछ सोग नहीं वो सच में ख़ुश है तो कोई बात नहीं

shaan manral

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गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा फ़लक पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सींखा मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री कागा बने हैं शैख़ चिल्ली कबूतर से हुई कचवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी जलेबी तैरती पानी पे आई मज़े ले ले के भिंडी ख़ूब खाई मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरियों ने खोटा पैसा गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध मीठा खा रहे थे फ़लक पर उड़ रहा है एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी सर-ए-राह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक तक गुनगुनाया मज़े से घास बंदर खा रहे थे चबा कर पान कव्वे गा रहे थे अज़ाँ मकड़ी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर

Vaqar Khaleel

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ख़ुद-कुशी के पुल पर समुंदर की लहरों में बहती फ़सुर्दा ओ नाकाम जिस्मों की रूहें बुलाती हैं मुझ को चले आओ हर ग़म से दामन छुड़ा लो मिटा दो फ़ना होने वाले बदन को मिटा दो फ़ना से न डरना यही अस्ल में ज़िंदगी है इसी में हक़ीक़ी ख़ुशी है समुंदर की लहरों में सय्याल रूहों के गीतों में बेहद कशिश है ये दिल चाहता है कि मैं जा मिलूँ उन से उन सा ही हो जाऊँ पर मैं उन्हें किस तरह ये बताऊँ कि ऐ इज़्तिराब-ए-मुसलसल के गिर्दाब में क़ैद रूहो मुझे तुम से हमदर्दी है प्यार है मैं ख़ुद चाहता हूँ मन ओ तू की सारी फ़सीलें फलाँगूँ मगर क्या करूँँ कुछ मुक़द्दस से रिश्ते दुआ-गो सी आँखें मुझे याद आती हैं चुप-चाप घर लौट आता हूँ मैं उन हसीं प्यारे लोगों की ख़ातिर तो जीना पड़ेगा ये ज़हराब पीना पड़ेगा

Faheem Shanas Kazmi

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परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार जाता है परिंदा बाल-ओ-पर है आँख है लेकिन सुनहरी चोंच से परवाज़ करता है सड़क पर धूप है और धूप में सायों के नाख़ुन हैं घरों में ख़ोल हैं और आँगनों में ख़ार उगते हैं किसी का कौन है कोई नहीं सब अजनबी हैं हैरत-ओ-हसरत में ज़िंदा हैं वो औरत है वो ख़्वाहिश के लपकते ख़ंजरों से प्यार करती है वो उस का हम-सफ़र है ख़ाक-ओ-ख़ूँ उस का मुक़द्दर है ये मौज-ए-आब है अब फूल है अब पेड़ है कल सिर्फ़ पत्ता है अगर ये ज़िंदगी करने की कोशिश में परेशाँ हैं ये अक्सर क़त्ल करते हैं ये अक्सर क़त्ल होते हैं लहू के पार गुलशन है मगर गुलशन लहू में है निगाहों में उजड़ते शहर की मानिंद तस्वीरों का मेला है हुजूम-ए-संग-ओ-आहन में कोई आवाज़ देता है कोई आवाज़ सुनता है मगर आवाज़ से आवाज़ का रिश्ता नहीं होता मगर आवाज़ से आवाज़ का हर हर सिलसिला बे-कार होता है ये मंज़र तैरता है आब-ए-जू में हाए लेकिन अजनबी क्यूँँ है मैं मंज़र हूँ तसलसुल हूँ मगर मैं अजनबी क्यूँँ हूँ ये फ़र्श-ए-आब-ओ-गिल मेरे लिए इक सिलसिला क्यूँँ है परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार चाहता हूँ परिंदा फ़ासला क्यूँँ है परिंदा मावरा क्यूँँ है

Balraj Komal

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"मगर ये ज़ख़्म ये मरहम" तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकार तुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैं बस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस में हम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं न वो नशात-ए-तसव्वुर कि लो तुम आ ही गए न ज़ख़्म-ए-दिल की है सोज़िश कोई जो सहनी हो न कोई वा'दा-ओ-पैमाँ की शाम है न सहर न शौक़ की है कोई दास्ताँ जो कहनी हो नहीं जो महमिल-ए-लैला-ए-आरज़ू सर-ए-राह तो अब फ़ज़ा में फ़ज़ा के सिवा कुछ और नहीं नहीं जो मौज-ए-सबा में कोई शमीम-ए-पयाम तो अब सबा में सबा के सिवा कुछ और नहीं उतार दे जो किनारे पे हम को कश्ती-ए-वहम तो गिर्द-ओ-पेश को गिर्दाब ही समझते हैं तुम्हारे रंग महकते हैं ख़्वाब में जब भी तो ख़्वाब में भी उन्हें ख़्वाब ही समझते हैं न कोई ज़ख़्म न मरहम कि ज़िंदगी अपनी गुज़र रही है हर एहसास को गँवाने में मगर ये ज़ख़्म ये मरहम भी कम नहीं शायद कि हम हैं एक ज़मीं पर और इक ज़माने में

Jaun Elia

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

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रात फिर तेरे ख़यालों ने जगाया मुझ को टिमटिमाती हुई यादों का ज़रा सा शो'ला आज भड़का तो फिर इक शोला-ए-जव्वाला बना अक़्ल ने तुझ को भुलाने के किए लाख जतन ले गए मुझ को कभी मिस्र के बाज़ारों में कभी इटली कभी एस्पेन के गुलज़ारों में बेल्जियम के, कभी हॉलैंड के मय-ख़ानों में कभी पैरिस, कभी लंदन के सनम-ख़ानों में और मैं अक़्ल की बातों में कुछ ऐसा आया मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद दिल ने तो मुझ से कई बार कहा वहम है ये इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं मैं मगर वहम में कुछ ऐसा गिरफ़्तार रहा मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद कल मगर फिर तिरी आवाज़ ने तड़पा ही दिया आलम-ए-ख़्वाब से गोया मुझे चौंका ही दिया और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था तिरी ज़ुल्फ़ें, तिरी ज़ुल्फ़ों की घटाओं का समाँ तिरी चितवन, तिरी चितवन वही बातिन का सुराग़ तिरे आरिज़ वही ख़ुश-रंग महकते हुए फूल तिरी आँखें वो शराबों के छलकते हुए जाम तिरे लब जैसे सजाए हुए दो बर्ग-ए-गुलाब तिरी हर बात का अंदाज़ तिरी चाल का हुस्न तिरे आने का नज़ारा तिरे जाने का समाँ तिरा हर नक़्श तो क्या तू ही मिरे सामने थी दिल ने जो बात कई बार कही थी मुझ से शब के अनवार में भी दिन के अँधेरों में भी मिरे एहसास में अब गूँज रही थी पैहम इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं दिल हक़ीक़त है कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ तो नहीं याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं डूबती ये नहीं हॉलैंड के मय-ख़ानों में गुम नहीं होती ये पैरिस के सनम-ख़ानों में ये भटकती नहीं एस्पेन के गुलज़ारों में भूलती राह नहीं मिस्र के बाज़ारों में याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है याद का आज भी अंदाज़ वही है कि जो था आज भी उस का है आहंग वही रंग वही भेस है उस का वही तौर वही ढंग वही फिर इसी याद ने कल रात जगाया मुझ को और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था

Jagan Nath Azad

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आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो नज़्ज़ारे दिखलाने वाला जग की सैर कराने वाला डब्बा अपने सर पे उठाए गली गली में जाने वाला आज तुम्हारे घर के बाहर रंग जमाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो उस ने डब्बा ला कर रखा तुम ने इक शीशे में झाँका तस्वीरों पर तस्वीरें हैं बिल्ली कुत्ता मैना तोता खेल तमाशे वाला इक संसार बसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो कितना अच्छा रंग जमाया एक ज़रा सा पेच घुमाया तुम ने चाँदनी चौक को खो कर कलकत्ते के शहर को पाया सर पे उठा कर कलकत्ते का शहर दिखाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो आगरे आओ ताज को देखो कल को देखो आज को देखो चाहो अगर तो यूरोप जा कर अफ़रंगी के राज को देखो तुम को सैर-सपाटे का शौक़ीन बनाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया आओ बच्चो दो पैसे में दुनिया भर की सैर करो गाड़ी लाया इंजन लाया पैरिस लाया लंदन लाया गठड़ी अपने सर पे उठाए बारह मन की धोबन लाया जितने रोते बच्चे थे उन सब को हँसाने आया दो पैसे में दुनिया भर की सैर कराने आया

Jagan Nath Azad

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फ़ासले की तो ख़ैर बात है और हैदराबाद दिल से दूर नहीं दिल्ली में यूँँ ज़बान पे आई दकन की बात सहरा में छेड़ देवे कोई जैसे चमन की बात बज़्म-ए-ख़िरद में छिड़ तो गई है दकन की बात अब इश्क़ ले के आएगा दार-ओ-रसन की बात इक हुस्न-ए-दकन था जो निगाहों से न छूटा हर हुस्न को वर्ना ब-ख़ुदा छोड़ गए हम 'आज़ाद' एक पल भी न दिल को सकूँ मिला रस्ते में दकन भी था कहीं लखनऊ के बा'द 'आज़ाद' फिर दकन का समुंदर है रू-ब-रू ले जा दिल-ओ-नज़र का सफ़ीना सँभाल कर

Jagan Nath Azad

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