nazmKuch Alfaaz

परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार जाता है परिंदा बाल-ओ-पर है आँख है लेकिन सुनहरी चोंच से परवाज़ करता है सड़क पर धूप है और धूप में सायों के नाख़ुन हैं घरों में ख़ोल हैं और आँगनों में ख़ार उगते हैं किसी का कौन है कोई नहीं सब अजनबी हैं हैरत-ओ-हसरत में ज़िंदा हैं वो औरत है वो ख़्वाहिश के लपकते ख़ंजरों से प्यार करती है वो उस का हम-सफ़र है ख़ाक-ओ-ख़ूँ उस का मुक़द्दर है ये मौज-ए-आब है अब फूल है अब पेड़ है कल सिर्फ़ पत्ता है अगर ये ज़िंदगी करने की कोशिश में परेशाँ हैं ये अक्सर क़त्ल करते हैं ये अक्सर क़त्ल होते हैं लहू के पार गुलशन है मगर गुलशन लहू में है निगाहों में उजड़ते शहर की मानिंद तस्वीरों का मेला है हुजूम-ए-संग-ओ-आहन में कोई आवाज़ देता है कोई आवाज़ सुनता है मगर आवाज़ से आवाज़ का रिश्ता नहीं होता मगर आवाज़ से आवाज़ का हर हर सिलसिला बे-कार होता है ये मंज़र तैरता है आब-ए-जू में हाए लेकिन अजनबी क्यूँँ है मैं मंज़र हूँ तसलसुल हूँ मगर मैं अजनबी क्यूँँ हूँ ये फ़र्श-ए-आब-ओ-गिल मेरे लिए इक सिलसिला क्यूँँ है परिंदा आसमाँ की नीलगूँ मेहराब के उस पार चाहता हूँ परिंदा फ़ासला क्यूँँ है परिंदा मावरा क्यूँँ है

Related Nazm

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

42 likes

"तुम्हारा ख़याल" भोर में सूरज की हल्की रौशनी से जब नदी का जल चमक जाता है तुम्हारा अक्स मुझे नज़र आता है निशा में; महताब की चाँदनी तले टिमटिमाते तारों को देखता हूँ तुम्हारा चेहरा निखर आता है हल्की बारिश के बा'द मिट्टी से आने वाली गंध सी हो तुम किसी पवित्र ग्रंथ सी हो तुम लापता हूँ मैं ख़ुद ही में मुझ में बसी हो तुम रूह की रूहानियत हो आँखों की नमी हो तुम तुम्हारी आवाज़ कोयल की मीठी बोली सी लगती हँ तुम हो तो मैं हूँ तुम्हीं से मेरी साँसे चलती हैं पंछियों की चहचहाहट से तुम्हारा मुस्कुराना याद आता है जब भी इबादत करे 'प्रीत' तुम्हारा ज़िक्र हो ही जाता है

Prit

7 likes

"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

13 likes

पानी कौन पकड़ सकता है जब वो इस दुनिया के शोर और ख़मोशी से क़त'अ-तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरे की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिसे सिर्फ़ दहकने से मतलब है, वो इक ऐसा फूल है जिस पर अपनी ख़ुशबू बोझ बनी है, वो इक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है, उस को छूने की ख़्वाइश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाकिफ़ है बल्कि हर इक रंग के शजरे तक से वाकिफ़ है, उस को इल्म है किन ख़्वाबों से आँखें नीली पढ़ सकती हैं, हम ने जिन को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी-कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खींचती है सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है, सिर्फ़ उसी के हाथों से सारी दुनिया तरतीब में आ सकती है, हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाइश में ज़िंदा है लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ है, हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की किस्मत में वो जिस्म कहाँ है मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है, उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कॉलेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

88 likes

More from Balraj Komal

तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई

Balraj Komal

0 likes

मैं नान-ए-सोख़्ता का ज़ाइक़ा उतारता हूँ रोज़-ओ-शब ज़बान पर कि उस की हमदमी में दोस्ती में उम्र के नशेब में अगर मैं ढल सकूँ तो फ़स्ल आफ़्ताब का वो बर्ग-ए-ज़र्द बन सकूँ जो दाएरे की इंतिहा पे सिर्फ़ मौसमों के ख़्वाब देखता हूँ सुब्ह-ओ-शाम सोचता हूँ आरज़ू फ़रेब-कार शाहिदा कहाँ मिली थी और कौन से हसीन मोड़ तक चलेगी मेरे साथ मेरे साथ जू-ए-आब जू-ए-मय रिदा-ए-ख़ाक दूर के सफ़र के लोग बद-गुमाँ साअ'तों के शहर मैं चलूँगा मैं दश्त-ओ-कोहसार की उदास हिजरतों को नन्ही-मुन्नी लोरियाँ सुनाऊँगा मैं जंगलों की सनसनाहटों के पार जाऊँगा

Balraj Komal

0 likes

शहसवार नन्हा-मुन्ना शहसवार ईस्तादा है ख़मीदा पुश्त पर मेरी जूँ-ही झुकता हूँ वो तर्ग़ीब देता है मुझे चलने की आवाज़ों की सरगम से मैं चलता हूँ मैं वामाँदा क़दम चलता हूँ वो महमेज़ की जुम्बिश से कहता है कि दौड़ो और दौड़ो, तेज़-तर, सरपट चलो बाद-ए-नग़्मा-कार से बातें करो उस का मैं रख़्श-ए-रज़ा तेज़-तर करता हूँ रफ़्तार-ए-ख़िराम मुझ को पहुँचाना है आज उस को रंगों तितलियों के देस में जादू-नगर में मेरे साए का भी अब शायद जहाँ मुंतज़िर कोई नहीं मुंतज़िर हैं उस के लेकिन, मेरे नन्हे दोस्त के देव-क़ामत सब्ज़ वारफ़्ता-वक़ार दूर तक सरगोशियाँ करते हुए अश्जार रक़्स-ए-बर्ग-ओ-बार जा रहा है ख़्वाब की रफ़्तार से दीवाना-वार मेरा नन्हा शहसवार

Balraj Komal

0 likes

उदासी घनी और गहरी उदासी का साया शगूफ़ों की सरगोशियाँ चंद चेहरों के ख़ाके निगाहों के मौहूम से दाएरों में कोई अजनबी बे-ज़बाँ रौशनी ये न फ़र्दा न मौजूद ये मुंक़लिब हो रहा है जो लम्हा अगर ये अमल है तो सिर्फ़ अमल है लब-ए-जू-ए-मय ख़ामुशी और सैद-ए-फ़ुग़ाँ कोई हर्फ़-ए-तकल्लुम कहीं रहगुज़र पर मिरे चश्म-ओ-लब और आवाज़ से रौशनी की कशाकश बहुत फ़ासला है मिरे और मेरे तसव्वुर के साहिल में उस से परे इक जहान-ए-दिगर है लब-ए-जू-ए-मय ग़र्क़-ए-आफ़ाक़ हूँ दूसरी बार शायद जन्म ले रहा हूँ

Balraj Komal

0 likes

हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो

Balraj Komal

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Balraj Komal.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Balraj Komal's nazm.