nazmKuch Alfaaz

फ़ासले की तो ख़ैर बात है और हैदराबाद दिल से दूर नहीं दिल्ली में यूँँ ज़बान पे आई दकन की बात सहरा में छेड़ देवे कोई जैसे चमन की बात बज़्म-ए-ख़िरद में छिड़ तो गई है दकन की बात अब इश्क़ ले के आएगा दार-ओ-रसन की बात इक हुस्न-ए-दकन था जो निगाहों से न छूटा हर हुस्न को वर्ना ब-ख़ुदा छोड़ गए हम 'आज़ाद' एक पल भी न दिल को सकूँ मिला रस्ते में दकन भी था कहीं लखनऊ के बा'द 'आज़ाद' फिर दकन का समुंदर है रू-ब-रू ले जा दिल-ओ-नज़र का सफ़ीना सँभाल कर

Related Nazm

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

42 likes

क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!

Raghav Ramkaran

42 likes

हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

22 likes

More from Jagan Nath Azad

कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

0 likes

ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

0 likes

मैं इस ख़याल में था बुझ चुकी है आतिश-ए-दर्द भड़क रही थी मिरे दिल में जो ज़माने से मैं इस ख़याल में था हो चुकी है आग वो सर्द वो एक शोला-ए-दर्द-आफ़रीं मता-ए-हयात मैं इस ख़याल में था मैं उसे बचा न सका गुमाँ ये था कि वो इक शोला-ए-हयात-अफ़रोज़ हवा-ए-पैरिस-ओ-लंदन की ताब ला न सका मैं सोचता था कि शायद भुला चुका हूँ तुझे जो अपने दिल की कहानी तुझे सुनाना थी वो अपने साज़-ए-ग़ज़ल पर सुना चुका हूँ तुझे कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है ज़माना वक़्त के पर्दे पे हर घड़ी शायद नया तिलिस्म नई दिलकशी सजाता है जो हैं रफ़ीक़-ए-दिल-ओ-जान उन आँसुओं की क़सम तिरे हुज़ूर अभी तक जो बार पा न सके जिन्हें है तुझ से सिवा तिरी आबरू का ख़याल जो दिल में रुक न सके और मिज़ा तक आ न सका मिला हूँ आज मैं तुझ से तो वसवसे ये तमाम मिटे ख़याल की दुनिया से मिस्ल-ए-नक़्श-बर-आब पता चला कि वो शो'ला बुझा नहीं है अभी बस इतनी बात है अब जल रहा है ज़ेर-ए-नक़ाब नक़ाब-ए-वक़्त-ओ-मसाफ़त के दो दबीज़ हिजाब गुज़र गई तिरी फ़ुर्क़त में ज़िंदगी जितनी अदन की सुब्ह कि पैरिस की रात में गुज़री दिल ओ नज़र के किसी वारदात में गुज़री कि इक हसीना-ए-आलम से बात में गुज़री फ़क़त वो एक नदामत है और कुछ भी नहीं और आज मेरी नदामत का ये शदीद एहसास हर एक साँस में मुझ से सवाल करता है हवस है इश्क़ से कितने क़दम? दो-चार क़दम? किया है फ़ासला उन में कई हज़ार क़दम? पिकैडली में भी हम याद थे तुझे कि न थे पिगाल में भी ख़लिश कोई दिल में थी की न थी वो शाम टेम्स की अब भी नज़र में है कि नहीं कि जब हवस की नज़र पर कोई हिजाब न था वो सतह-ए-बहर पे रक़्साँ जहाज़ का अर्शा और उस पे चार तरफ़ एक नूर का आलम कि जैसे बर्क़-ए-तजल्ली-ए-तूर का आलम वेलेंशिया में वो रक़्स-ए-बरहनगी के तिलिस्म तिरी निगाह-ए-तमाशा को कुछ झिजक तो न थी ये इक सवाल कि जिस के हज़ार पहलू हैं मैं एक लम्हे को जब इन पे ग़ौर करता हूँ तो सोचता हूँ की मैं तुझ से अब मलूँ न मलूँ

Jagan Nath Azad

0 likes

अस्सलाम ऐ अज़्मत-ए-हिन्दोस्ताँ की यादगार ऐ शहंशाह-ए-दयार-ए-दिल फ़क़ीर-ए-बे-दयार आज पहली बार तेरी क़ब्र पर आया हूँ मैं बे-नवा हूँ नज़्र को बे-लौस दिल लाया हूँ मैं गर्दिश-ए-तक़दीर के हाथों वतन से दूर हूँ एक बुलबुल हूँ मगर सेहन-ए-चमन से दूर हूँ शौक़ आज़ादी का मुझ को खींच लाया है यहाँ आज दुश्मन है ज़मीं मेरी अदू है आसमाँ मैं भी हूँ अपने वतन से दूर तू भी दूर है हाँ रज़ा-ए-पाक-ए-यज़्दाँ को यही मंज़ूर है मेरा दामन भी यहाँ की ख़ाक से आलूदा है फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है मैं आवारा तू आसूदा है ऐ शह-ए-ख़्वाबीदा ऐ तक़दीर-ए-बेदार-ए-वतन आइना मेरी निगाहों पर है ओ बार-ए-वतन मेरे दिल को याद है अब तक वो सत्तावन की जंग जिस के बा'द इस सर ज़मीं पे छा गए अहल-ए-फ़रंग मेरी नज़रों में है मेरठ और देहली का ज़वाल जानता हूँ मैं जो था झांसी की रानी का मआल मैं नहीं भूला अभी अंजाम-ए-नाना-फ़रनवीस है नज़र में कोशिश-ए-नाकाम-ए-नाना-फ़रनवीस दास्ताँ जैसे भी हो गुज़री वो सब मालूम है तेरे दिल-बन्दों पे जो गुज़री वो सब मालूम है ये वतन रौंदा है जिस को मुद्दतों अग़्यार ने जिस पे ढाए ज़ुल्म लाखों चर्ख़-ए-ना-हंजार ने जिस को रक्खा मुद्दतों क़िस्मत ने ज़िल्लत-आश्ना जिस ने हर पहलू में देखी पस्तियों की इंतिहा आज फिर उस मुल्क में इक ज़िंदगी की लहर है ख़ाक से अफ़्लाक तक ताबिंदगी की लहर है आज फिर इस मुल्क के लाखों जवाँ बेदार हैं हुर्रियत की राह में मिटने को जो तय्यार हैं आज फिर है बे-नियाम इस मुल्क की शमशीर देख सोने वाले जाग अपने ख़्वाब की ता'बीर देख इस तरह लरज़े में है बुनियाद-ए-ऐवान-ए-फ़रंग खा चुके हैं मात गोया शीशा-बाज़ान-ए-फ़रंग हुब्ब-ए-क़ौमी के तरानों से हवा लबरेज़ है और तोपों की दनादन से फ़ज़ा लबरेज़ है शोर गीर-ओ-दार का है फिर फ़ज़ाओं में बुलंद आज फिर हिम्मत ने फेंकी है सितारों पर कमंद फिर उमंगें आरज़ूएँ हैं दिलों में बे-क़रार क़ौम को याद आ गया है अपना गुम-गश्ता वक़ार नौजवानों के दिलों में सरफ़रोशी की उमंग इश्क़ बाज़ी ले गया है अक़्ल बेचारी है दंग आज फिर इस देस में झंकार तलवारों की है कुछ निराली कैफ़ियत फिर देस के प्यारों की है जो तवानाई इरादों में है कोहसारों की है ज़र्रे ज़र्रे में निहाँ ताबिंदगी तारों की है ये नज़ारा आह लफ़्ज़ों में समा सकता नहीं आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं फ़त्ह-ए-नुसरत की दु'आओं से हुआ मा'मूर है नारा-ए-जय-हिंद से सारी फ़ज़ा मा'मूर है मुझ को ऐ शाह-ए-वतन अपने इरादों की क़सम जिन के सर काटे गए इन शाह-ज़ादों की क़सम तेरे मरक़द की मुक़द्दस ख़ाक की मुझ को क़सम मैं जहाँ हूँ उस फ़ज़ा-ए-पाक की मुझ को क़सम अपने भूके जाँ-ब-लब बंगाल की मुझ को क़सम हाकिमों के दस्त-परवर काल की मुझ को क़सम लाल-क़िले के ज़वाल ओ शहर-ए-देहली की क़सम मोहसिन-ए-देहली मआल-ए-शहर-ए-देहली की क़सम मैं तिरी खोई हुई अज़्मत को वापस लाऊँगा और तिरे मरक़द पे नुसरत-याब हो कर आऊँगा तेग़-ए-हिन्दी जिस का लोहा मानता है इक जहाँ जिस की तेज़ी की गवाही दे रहा है आसमाँ तेग़-ए-हिन्दी जिस को मैं ने कर दिया है बे-नियाम जिस का शेवा हुर्रियत-केशी जहाँगीरी है काम जिस ने पूरी मुंसिफ़ी की आज तक दुनिया के साथ ज़ुल्म की दुश्मन है जो इक ज़ुल्म-ए-बे-पर्दा के साथ हर क़दम पर जिस ने बातिल को मिलाया ख़ाक में जिस के साखों की अभी तक गूँज है अफ़्लाक में आज फिर अपनी नज़र जिस की चमक से ख़ीरा है जिस की ताबानी से रौशन इक जहान-ए-तीरा है इक जज़ीरे के हसीं साहिल से जब टकराएगी चैन से मुझ को भड़कती आग में नींद आएगी

Jagan Nath Azad

0 likes

इस तरह आज फिर आबाद है वीराना-ए-दिल कि है लबरेज़ मय-ए-शौक़ से पैमाना-ए-दिल दिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़र चश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिल आज शम्ओं से ये कह दो कि ख़बर-दार रहें आज बेदार है ख़ाकिस्तर-ए-परवाना-ए-दिल इस को है एक फ़क़त देखने वाला दरकार तूर से कम तो नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल जाग भी ख़्वाब से ऐ मशरिक़ ओ मग़रिब के हकीम कि तिरे वास्ते लाया हूँ मैं नज़राना-ए-दिल ये ज़रा देख कि आए हैं कहाँ से दोनों दिल तिरी ख़ाक का दीवाना मैं दीवाना-ए-दिल शौक़ की राह में इक सख़्त मक़ाम आया है मिरा टूटा हुआ दिल ही मिरे काम आया है साक़ी-ए-जाँ तिरे मय-ख़ाने का इक रिंद-ए-हक़ीर मिस्ल-ए-बू तोड़ के हर क़ैद-ए-मक़ाम आया है अल्लाह अल्लाह तिरी बज़्म का ये आलम-ए-कैफ़ मेरे हाथों में छलकता हुआ जाम आया है तिरे नाम आज ज़माने के महकते हुए फूल 'ग़ालिब' ओ 'मीर' के गुलशन का सलाम आया है वो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलील कितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया है तुझ को भी दिल में बसाया है जो 'इक़बाल' के साथ तो कहीं जा के ये अंदाज़-ए-कलाम आया है क्यूँँ तुझे ये अबदी नींद पसंद आई है ऐ कि हर लफ़्ज़ तिरा शान-ए-मसीहाई है साक़ी-ए-मय-कदा-ए-ज़ीस्त ज़रा आँख तो खोल तिरी तुर्बत पे सियह मस्त घटा छाई है जाग भी ख़्वाब से दिल-दादा-ए-गुलज़ार-ओ-चमन कि तिरे देस की बाग़ों पे बहार आई है जो तिरे घर में है आज उस चमनिस्ताँ को तो देख ज़र्रे ज़र्रे को जुनून-ए-चमन-आराई है 'हाथवे' का है मकाँ वो कि ''मक़ाम-ए-नौ'' है जो भी ख़ित्ता है वो इक पैकर-ए-ज़ेबाई है कुछ ख़बर भी है कि ऐवाँ की हसीं मौजों में जो तिरे दौर में थी अब भी वो रा'नाई है वो तिरा नग़्मा कि सीनों में तपाँ आज भी है अहल-ए-एहसास का सरमाया-ए-जाँ आज भी है रिंद हैं मशरिक़ ओ मग़रिब में उसी के मुश्ताक़ वो तिरा बादा-ए-कोहना कि जवाँ आज भी है आज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्र विर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी है आज से चार सदी क़ब्ल जो चमका था कभी तिरे नग़्मात में वो सोज़-ए-निहाँ आज भी है जिस में है बादा जुनूँ का भी मय-ए-होश के साथ तिरे हाथों में वही रत्ल-ए-गिराँ आज भी है तू ने तमसील के जादे पे दिखाया जो कभी वही मील और वही संग-ए-निशाँ आज भी है ज़ुल्मत-ए-दहर की रातों में सहर-बार है तू ज़ीस्त इक क़ाफ़िला है क़ाफ़िला-सालार है तू तू हर इक दौर में है दीदा-ए-बीना की तरह हर ज़माने में दिल-ए-ज़िंदा-ओ-बेदार है तू जिस की बातों में धड़कता है दिल-ए-अस्र-ए-रवाँ आज तमसील-ए-ज़माना का वो किरदार है तू क्यूँँ न हो लौह ओ क़लम को तिरे उस्लूब पे नाज़ हसन-ए-गुफ़्तार है गंजीना-ए-अफ़्कार है तू बज़्म-ए-जानाँ हो तो अंदाज़ तिरा फूल की शाख़ ज़ुल्म के सामने शमशीर-ए-जिगर-दार है तो तू किसी मुल्क किसी दौर का फ़नकार नहीं बल्कि हर मुल्क का हर दौर का फ़नकार है तू

Jagan Nath Azad

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Jagan Nath Azad.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Jagan Nath Azad's nazm.