nazmKuch Alfaaz

अस्सलाम ऐ अज़्मत-ए-हिन्दोस्ताँ की यादगार ऐ शहंशाह-ए-दयार-ए-दिल फ़क़ीर-ए-बे-दयार आज पहली बार तेरी क़ब्र पर आया हूँ मैं बे-नवा हूँ नज़्र को बे-लौस दिल लाया हूँ मैं गर्दिश-ए-तक़दीर के हाथों वतन से दूर हूँ एक बुलबुल हूँ मगर सेहन-ए-चमन से दूर हूँ शौक़ आज़ादी का मुझ को खींच लाया है यहाँ आज दुश्मन है ज़मीं मेरी अदू है आसमाँ मैं भी हूँ अपने वतन से दूर तू भी दूर है हाँ रज़ा-ए-पाक-ए-यज़्दाँ को यही मंज़ूर है मेरा दामन भी यहाँ की ख़ाक से आलूदा है फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है मैं आवारा तू आसूदा है ऐ शह-ए-ख़्वाबीदा ऐ तक़दीर-ए-बेदार-ए-वतन आइना मेरी निगाहों पर है ओ बार-ए-वतन मेरे दिल को याद है अब तक वो सत्तावन की जंग जिस के बा'द इस सर ज़मीं पे छा गए अहल-ए-फ़रंग मेरी नज़रों में है मेरठ और देहली का ज़वाल जानता हूँ मैं जो था झांसी की रानी का मआल मैं नहीं भूला अभी अंजाम-ए-नाना-फ़रनवीस है नज़र में कोशिश-ए-नाकाम-ए-नाना-फ़रनवीस दास्ताँ जैसे भी हो गुज़री वो सब मालूम है तेरे दिल-बन्दों पे जो गुज़री वो सब मालूम है ये वतन रौंदा है जिस को मुद्दतों अग़्यार ने जिस पे ढाए ज़ुल्म लाखों चर्ख़-ए-ना-हंजार ने जिस को रक्खा मुद्दतों क़िस्मत ने ज़िल्लत-आश्ना जिस ने हर पहलू में देखी पस्तियों की इंतिहा आज फिर उस मुल्क में इक ज़िंदगी की लहर है ख़ाक से अफ़्लाक तक ताबिंदगी की लहर है आज फिर इस मुल्क के लाखों जवाँ बेदार हैं हुर्रियत की राह में मिटने को जो तय्यार हैं आज फिर है बे-नियाम इस मुल्क की शमशीर देख सोने वाले जाग अपने ख़्वाब की ता'बीर देख इस तरह लरज़े में है बुनियाद-ए-ऐवान-ए-फ़रंग खा चुके हैं मात गोया शीशा-बाज़ान-ए-फ़रंग हुब्ब-ए-क़ौमी के तरानों से हवा लबरेज़ है और तोपों की दनादन से फ़ज़ा लबरेज़ है शोर गीर-ओ-दार का है फिर फ़ज़ाओं में बुलंद आज फिर हिम्मत ने फेंकी है सितारों पर कमंद फिर उमंगें आरज़ूएँ हैं दिलों में बे-क़रार क़ौम को याद आ गया है अपना गुम-गश्ता वक़ार नौजवानों के दिलों में सरफ़रोशी की उमंग इश्क़ बाज़ी ले गया है अक़्ल बेचारी है दंग आज फिर इस देस में झंकार तलवारों की है कुछ निराली कैफ़ियत फिर देस के प्यारों की है जो तवानाई इरादों में है कोहसारों की है ज़र्रे ज़र्रे में निहाँ ताबिंदगी तारों की है ये नज़ारा आह लफ़्ज़ों में समा सकता नहीं आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं फ़त्ह-ए-नुसरत की दु'आओं से हुआ मा'मूर है नारा-ए-जय-हिंद से सारी फ़ज़ा मा'मूर है मुझ को ऐ शाह-ए-वतन अपने इरादों की क़सम जिन के सर काटे गए इन शाह-ज़ादों की क़सम तेरे मरक़द की मुक़द्दस ख़ाक की मुझ को क़सम मैं जहाँ हूँ उस फ़ज़ा-ए-पाक की मुझ को क़सम अपने भूके जाँ-ब-लब बंगाल की मुझ को क़सम हाकिमों के दस्त-परवर काल की मुझ को क़सम लाल-क़िले के ज़वाल ओ शहर-ए-देहली की क़सम मोहसिन-ए-देहली मआल-ए-शहर-ए-देहली की क़सम मैं तिरी खोई हुई अज़्मत को वापस लाऊँगा और तिरे मरक़द पे नुसरत-याब हो कर आऊँगा तेग़-ए-हिन्दी जिस का लोहा मानता है इक जहाँ जिस की तेज़ी की गवाही दे रहा है आसमाँ तेग़-ए-हिन्दी जिस को मैं ने कर दिया है बे-नियाम जिस का शेवा हुर्रियत-केशी जहाँगीरी है काम जिस ने पूरी मुंसिफ़ी की आज तक दुनिया के साथ ज़ुल्म की दुश्मन है जो इक ज़ुल्म-ए-बे-पर्दा के साथ हर क़दम पर जिस ने बातिल को मिलाया ख़ाक में जिस के साखों की अभी तक गूँज है अफ़्लाक में आज फिर अपनी नज़र जिस की चमक से ख़ीरा है जिस की ताबानी से रौशन इक जहान-ए-तीरा है इक जज़ीरे के हसीं साहिल से जब टकराएगी चैन से मुझ को भड़कती आग में नींद आएगी

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मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन गुल-पोश तेरी वादियाँ फ़रहत-निशाँ राहत-रसाँ तेरे चमन-ज़ारों पे है गुलज़ार-ए-जन्नत का गुमाँ हर शाख़ फूलों की छड़ी हर नख़्ल-ए-तूबा है यहाँ कौसर के चश्में जा-ब-जा तसनीम हर आब-ए-रवाँ हर बर्ग रूह-ए-ताज़गी हर फूल जान-ए-गुल्सिताँ हर बाग़ बाग़-ए-दिल-कशी हर बाग़ बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँ दिलकश चरागाहें तिरी ढोरों के जिन में कारवाँ अंजुम-सिफ़त गुलहा-ए-नौ हर तख़्ता-ए-गुल आसमाँ नक़्श-ए-सुरय्या जा-ब-जा हर हर रविश इक कहकशाँ तेरी बहारें दाइमी तेरी बहारें जावेदाँ तुझ में है रूह-ए-ज़िंदगी पैहम रवाँ पैहम दवाँ दरिया वो तेरे तुंद-ख़ू झीलें वो तेरी बे-कराँ शाम-ए-अवध के लब पे है हुस्न-ए-अज़ल की दास्ताँ कहती है राज़-ए-सरमदी सुब्ह-ए-बनारस की ज़बाँ उड़ता है हफ़्त-अफ़्लाक पर उन कार-ख़ानों का धुआँ जिन में हैं लाखों मेहनती सनअत-गरी के पासबाँ तेरी बनारस की ज़री रश्क-ए-हरीर-ओ-परनियाँ बीदर की फ़नकारी में हैं सनअत की सब बारीकियाँ अज़्मत तिरे इक़बाल की तेरे पहाड़ों से अयाँ दरियाओं का पानी, तरी तक़्दीस का अंदाज़ा-दाँ क्या 'भारतेंदु' ने किया गंगा की लहरों का बयाँ 'इक़बाल' और चकबस्त हैं अज़्मत के तेरी नग़्मा-ख़्वाँ 'जोश' ओ 'फ़िराक़' ओ 'पंत' हैं तेरे अदब के तर्जुमाँ 'तुलसी' ओ 'ख़ुसरव' हैं तेरी ता'रीफ़ में रत्ब-उल-लिसाँ गाते हैं नग़्मा मिल के सब ऊँचा रहे तेरा निशाँ मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तेरे नज़ारों के नगीं दुनिया की ख़ातम में नहीं सारे जहाँ में मुंतख़ब कश्मीर की अर्ज़-ए-हसीं फ़ितरत का रंगीं मोजज़ा फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं हाँ हाँ हमीं अस्त ओ हमीं सरसब्ज़ जिस के दश्त हैं जिस के जबल हैं सुर्मगीं मेवे ब-कसरत हैं जहाँ शीरीं मिसाल-ए-अंग्बीं हर ज़ाफ़राँ के फूल में अक्स-ए-जमाल-ए-हूरईं वो मालवे की चाँदनी गुम जिस में हों दुनिया-ओ-दीं इस ख़ित्ता-ए-नैरंग में हर इक फ़ज़ा हुस्न-आफ़रीं हर शय में हुस्न-ए-ज़िंदगी दिलकश मकाँ दिलकश ज़मीं हर मर्द मर्द-ए-ख़ूब-रू हर एक औरत नाज़नीं वो ताज की ख़ुश-पैकरी हर ज़ाविए से दिल-नशीं सनअत-गरों के दौर की इक यादगार-ए-मरमरीं होती है जो हर शाम को फ़ैज़-ए-शफ़क़ से अहमरीं दरिया की मौजों से अलग या इक बत-ए-नज़्ज़ारा-बीं या ताएर-ए-नूरी कोई परवाज़ करने के क़रीं या अहल-ए-दुनिया से अलग इक आबिद-ए-उज़्लत-गुज़ी नक़्श-ए-अजंता की क़सम जचता नहीं अर्ज़ंग-ए-चीं शान-ए-एलोरा देख कर झुकती है आज़र की जबीं चित्तौड़ हो या आगरा ऐसे नहीं क़िलए कहीं बुत-गर हो या नक़्क़ाश हो तू सब की अज़्मत का अमीं मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन दिलकश तिरे दश्त ओ चमन रंगीं तिरे शहर ओ चमन तेरे जवाँ राना जवाँ तेरे हसीं गुल पैरहन इक अंजुमन दुनिया है ये तू इस में सद्र-ए-अंजुमन तेरे मुग़न्नी ख़ुश-नवा शाएर तिरे शीरीं-सुख़न हर ज़र्रा इक माह-ए-मुबीं हर ख़ार रश्क-ए-नस्तरीं ग़ुंचा तिरे सहरा का है इक नाफ़ा-ए-मुश्क-ए-ख़ुतन कंकर हैं तेरे बे-बहा पत्थर तिरे लाल-ए-यमन बस्ती से जंगल ख़ूब-तर बाग़ों से हुस्न अफ़रोज़ बन वो मोर वो कब्क-ए-दरी वो चौकड़ी भरते हिरन रंगीं-अदा वो तितलियाँ बाँबी में वो नागों के फन वो शे'र जिन के नाम से लरज़े में आए अहरमन खेतों की बरकत से अयाँ फ़ैज़ान-ए-रब्ब-ए-ज़ुल-मिनन चश्मों के शीरीं आब से लज़्ज़त-कशाँ काम-ओ-दहन ताबिंदा तेरा अहद-ए-नौ रौशन तिरा अहद-ए-कुहन कितनों ने तुझ पर कर दिया क़ुर्बान अपना माल धन कितने शहीदों को मिले तेरे लिए दार-ओ-रसन कितनों को तेरा इश्क़ था कितनों को थी तेरी लगन तेरे जफ़ा-कश मेहनती रखते हैं अज़्म-ए-कोहकन तेरे सिपाही सूरमा बे-मिस्ल यक्ता-ए-ज़मन 'भीषम' सा जिन में हौसला 'अर्जुन' सा जिन में बाँकपन आलिम जो फ़ख़्र-ए-इल्म हैं फ़नकार नाज़ाँ जिन पे फ़न 'राय' ओ 'बोस' ओ 'शेरगिल' 'दिनकर', 'जिगर' 'मैथली-शरण' 'वलाठोल', 'माहिर', भारती 'बच्चन', 'महादेवी', 'सुमन' 'कृष्णन', 'निराला', 'प्रेम-चंद' 'टैगोर' ओ 'आज़ाद' ओ 'रमन' मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन खेती तिरी हर इक हरी दिलकश तिरी ख़ुश-मंज़री तेरी बिसात-ए-ख़ाक के ज़र्रे हैं महर-ओ-मुश्तरी झेलम कावेरी नाग वो गंगा की वो गंगोत्री वो नर्बदा की तमकनत वो शौकत-ए-गोदावरी पाकीज़गी सरजू की वो जमुना की वो ख़ुश-गाैहरी दुल्लर्बा आब-ए-नील-गूँ कश्मीर की नीलम-परी दिलकश पपीहे की सदा कोयल की तानें मद-भरी तीतर का वो हक़ सिर्रहु तूती का वो विर्द-ए-हरी सूफ़ी तिरे हर दौर में करते रहे पैग़म्बरी 'चिश्ती' ओ 'नानक' से मिली फ़क़्र-ओ-ग़िना को बरतरी अदल-ए-जहाँगीरी में थी मुज़्मर रेआया-पर्वरी वो नव-रतन जिन से हुई तहज़ीब-ए-दौर-ए-अकबरी रखते थे अफ़्ग़ान-ओ-मुग़ल इक सौलत-ए-अस्कंदरी रानाओं के इक़बाल की होती है किस से हम-सरी सावंत वो योद्धा तिरे तेरे जियाले वो जरी नीती विदुर की आज तक करती है तेरी रहबरी अब तक है मशहूर-ए-ज़माँ 'चाणक्य' की दानिश-वरी वयास और विश्वामित्र से मुनियों की शान-ए-क़ैसरी पातंजलि ओ साँख से ऋषियों की हिकमत-पर्वरी बख़्शे तुझे इनआम-ए-नौ हर दौर चर्ख़-ए-चम्बरी ख़ुश-गाैहरी दे आब को और ख़ाक को ख़ुश-जौहरी ज़र्रों को महर-अफ़्शानियाँ क़तरों को दरिया-गुस्तरी मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के अजियारे वतन हर आँख के तारे वतन तू रहबर-ए-नौ-ए-बशर तू अम्न का पैग़ाम-बर पाले हैं तू ने गोद में साहिब-ख़िरद साहिब-ए-नज़र अफ़ज़ल-तरीं इन सब में है बापू का नाम-ए-मो'तबर हर लफ़्ज़ जिस का दिल-नशीं हर बात जिस की पुर-असर जिस ने लगाया दहर में नारा ये बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर बे-कार हैं तीर-ओ-सिनाँ बे-सूद हैं तेग़-ओ-तबर हिंसा का रस्ता झूट है हक़ है अहिंसा की डगर दरमाँ है ये हर दर्द का ये हर मरज़ का चारा-गर जंगाह-ए-आलम में कोई इस से नहीं बेहतर सिपर करता हूँ मैं तेरे लिए अब ये दुआ-ए-मुख़्तसर रौनक़ पे हों तेरे चमन सरसब्ज़ हों तेरे शजर नख़्ल-ए-उमीद-ए-बेहतरी हर फ़स्ल में हो बारवर कोशिश हो दुनिया में कोई ख़ित्ता न हो ज़ेर-ओ-ज़बर तेरा हर इक बासी रहे नेको-सिफ़त नेको-सियर हर ज़न सलीक़ा-मंद हो हर मर्द हो साहिब-हुनर जब तक हैं ये अर्ज़ ओ फ़लक जब तक हैं ये शम्स ओ क़मर मेरे वतन, प्यारे वतन राहत के गहवारे वतन हर दिल के उजयारे वतन हर आँख के तारे वतन

Arsh Malsiyani

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"गुज़िश्ता" पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं तेरी उन तंग गलियों और उन छतों पर धूल चढ़ी किताबों और उन खतों पर उस गुलज़ार-ए-रिज़वा के फूलों की उदास ख़ुशबू में पेड़ों की चुभती छाँव में शहर के कैफ़े में और मेरे उस छोटे से गाँव में तितलियों की ढलती रा'नाई में कोयलों की बुझती गिनाई में उन मजलूमों की रंजीदा एहतिमाम-ए-रा'नाई में तेरी हथेलियों पर लगी किसी और के नाम की हीनाई में तेरी चौखट पर तेरी खिड़की पे मेरी आँखों में तुम्हारी सिड़की ने मेरी तवक़्क़ो' को तोड़ दिया है तू ने मुझ को छोड़ दिया है मेरे आज़ुर्दा ख़्वाब बिखर चुके हैं भीतर ही भीतर मर चुके हैं बेहतर की तलाश में ख़ुशतर दिन गुज़र चुके हैं तेरे वस्ल में दुनिया को दर-गुज़र चुके हैं तेरी ग़ैर-मौजूदगी और ये मेरी बे-तकान अफ़ज़ाइश-ए-मोहब्बत तेरे लिए दम तोड़ती हुई उम्मीद-ए-दीदार तेरा सरकता हुआ इश्क़ और ये रक़ीब से क़रार-दाद-ए-इज़दिवाज सब मिल कर मुझे ख़ुद–कुशी के लिए तस्ख़ीर कर चुके हैं क्लास की उस बेंच पर डाइरी के पन्नों में ग़ज़ल-ओ-नज़्म के मानी में ख़ुश्क होंठों पर आँखों के पानी में जो याद-ए-गुज़िश्ता क़ैद थी अब मेरे भीतर भटक रही है वो एक बात जो कहनी है मेरे गले में अटक रही है क्या ये सच है तू भी उसे चाहने लगी है–झूठ कल तक तो तेरे पास मेरी माँ की कटक रही है और क्यूँ मेरी दी हुई लाकेट तेरे गले में लटक रही है मैं कैसे क्या ही कर लूँगा अगर तू ही हटक रही है पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं ये आख़िरी ख़त था जो मैं ने उसे भेजा था वो आख़िरी रात थी जब मैं ने उसे देखा था उस ने हर बार की तरह क़ाबिल-ए-तर्जीह नहीं समझा उस ने हर बार की तरह मेरे क़रीह को क़रीह नहीं समझा मैं तो पागल हूँ इश्क़ मेरा मौला तड़प मेरी तक़दीर हिज्र मेरा मुक़द्दर उदास शा में तन्हा रातें भीगी सुब्ह कसक ख़लिश टीस दिल की ज़रूरत समझी सो फ़रेब बे-वफ़ाई हरजाई-पन बद-'अहदी बक्शी शा'इरी भी की मैं ने तो उस ने उसे मदीह नहीं समझा मोहब्बत को ख़ुदा कहा मा'शूक़ को फ़क़ीह नहीं समझा काज़िबा को मसीह समझा उस की बाहों को बाम-ए-मसीह समझा उस ने हज्व-ए-मलीह की मेरे मलीह रंग पर नक़ीह थे तो नक़ीह समझा मुझे क़ाबिल-ए-तम्दीह नहीं समझा मैं ने हमेशा दस्त-गिरी की उस की जिस ने मुझे कभी नहीं समझा उस ने जितनी हो सकी बदनामी की इश्क़ में अना कुचली मैं ने कभी ख़ुद को फ़ज़ीह नहीं समझा पढ़ते पढ़ते ही लिखने का फ़न आ गया मैं ने कोई तरशीह नहीं समझा उस ने तेरे साथ क्या किया है–समझता है मोहब्बत शायद बे-वफ़ाई नहीं और सोच पता नहीं और तो या'नी तू नहीं समझा– जी कुछ नहीं समझा तू ने उसे क्या समझा– जी बहुत कुछ समझा उस ने तुझे क्या समझा– जी कुछ नहीं समझा अब तो समझे– जी कुछ नहीं समझा ये सब कहा था मेरे यारों ने उस रात लगा था ये रात नहीं गुज़रेगी फिर वो रात गुज़र गई सारी ख़्वाब-ओ-ख़्वाहिश एक साथ बिखर गई वो बियाह कर के एक अफ़सर के साथ रोई तो मगर गई बे-वफ़ाई थी या वो मजबूर थी जो भी था मुझ सेे बिछड़ के उस के अंदर एक लड़की मर गई मुझ सेे कहती थी डरते क्यूँ हो मैं तेरे साथ हूँ फिर वक़्त आने पर वो लड़की ही डर गई उस सेे बिछड़ के मैं टूट गया वो बिखर गई लगा था अब साँसें जैसे रुक जाएँगी नहीं रुकी लगा था ये सरगम टूट जाएगी सो टूट गई दिल की धड़कन मगर नहीं रुकी लगा था ये दिन ये रात ये सुब्ह ये शाम ये बादल ये घटा ये सूरज ये चाँद ये तारे ये धूप ये छाँव ये हवा ये बारिश ये हँसी ख़ुशी चेहरे की ये चहल पहल लोगों की ये फूल महकते हुए ये चिड़िया चहकती हुई मेरा दिल है के ग़ज़ा ये मचलती हुई फ़ज़ा सब रुक जाएगा कुछ नहीं रुका लगा था एक आँधी एक तूफ़ान आएगा जो सब बहा ले जाएगा बादल फटेंगे बाँध टूटेगा पहाड़ तोड़ के पानी सारे शहर तबाह कर देगा जैसे उस ने मेरे दिल को किया है कुछ नहीं हुआ आँख से बस एक बूँद टपकी और दोस्त ने कहा वो तो जा चुकी कब की मुझे भी पता था जबकि ये बात थी तबकी जिस रात उस ने ये तअल्लुक़ तोड़ा था जिस रात उस ने ये शहर छोड़ा था उस बात को कई बरस बीत चुके हैं अब तो उस के बिना रहना भी सीख चुका हूँ उस की याद में उस के इंतिज़ार में काफ़ी कुछ लिख चुका हूँ उस सेे कहना मगर फिर भी आज भी मैं रातों में जगता हूँ चुपके चुपके सारी ख़बर रखता हूँ खाने से पहले उस का निवाला रखता हूँ तन्हा बैठ के ही सही रात को चाँद तकता हूँ वो तो आज भी मेरी या अमर है पूछना था अब मैं उस का क्या लगता हूँ मैं तो उस की यादों में जीता हूँ उस पे मरता हूँ और सच कहने से भी नहीं डरता हूँ उस सेे इश्क़ करता था और अब भी उसी से करता हूँ पता नहीं अब उस के दिल में क्या है मेरे लिए मैं तो मगर मर मिटा हूँ उस के लिए उस सेे कहना था उस सेे पूछना था पूछना था तुझे याद भी है तू मुझे याद करती थी हम दोनों कभी 'उश्शाक़ थे तू ख़ामोश बैठी रह बेशक मगर दुनिया तो आज भी तेरा नाम मेरे साथ लेती है तू ने क्यूँ नहीं दिया लड़कियाँ तो साथ देती हैं ख़ैर रोज़ ऐसे नए सवाल ज़ेहन में आते रहते हैं मेरे यार और मैं रोज़ ख़ुद तेरे हिमायती बनके मेरे दिल को समझाते रहते हैं बताते रहते हैं बिछड़ने वाले में सब कुछ था बे-वफ़ाई न थी मगर थी ये तो बस हम दोनों जानते हैं बस यही सब सोचता रहता हूँ ख़ुद के नाख़ूनों से इन ज़ख़्मों को नोचता रहता हूँ तेरे साथ बिताए हर एक लम्हे में गुम हूँ मैं अब मैं नहीं हूँ अब मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम हूँ अपने माज़ी की दीवार के मलबे में दबा पड़ा हूँ तू कभी आएगी तो पाएगी मैं कब का मरा पड़ा हूँ सोचता रहता हूँ हम लोग हर पल तन्हा क्यूँ होते हैं हर पल शोरीदा क़िस्मत पर क्यूँ रोते हैं बस एक दहलीज़ पर ही क्यूँ सोते हैं अपना आपा क्यूँ खोते हैं हम शाइ'र ऐसे क्यूँ होते हैं एक बात बताओ तू मुझे मिली भी और तू मिली भी नहीं फूल खिले भी और खिले भी नहीं तू आई तो मेरे ज़ख़्म सिले मगर सिले भी नहीं पहली मोहब्बत कोई और थी मगर तुझे चाहा उस सेे ज़ियादा था सो तेरे बिछड़ने का ग़म जानाँ पहली वालियों से भी ज़ियादा था मेरा तुझ सेे इश्क़ नहीं शादी का इरादा था मैं ने तो पीपल पर धागा भी बाँधा था तू ने मगर बीच राह में ही हाथ छोड़ दिया– क्यूँ तू ने मेरा दिल तोड़ दिया– क्यूँ हबाब तेरी याद का फूटता नहीं सुना था घर का लाल टूटता नहीं लुटने वाले लुटते हैं कोई लूटता नहीं मरासिम टूट भी जाए उन्स छूटता नहीं हाथ छूट जाता है साथ छूट जाता है ख़्वाब टूट जाता है ख़्वाहिश छूट जाती है आदत छूट जाती है इबादत छूट जाती है दिल टूट जाता है तर्ज़ टूट जाती है 'इल्लत छूट ती नहीं तवक़्क़ो' टूट ती नहीं रब्त टूट जाता है रिश्ता टूटता नहीं गुज़िश्ता छूटता नहीं

Chhayank Tyagi

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"आख़िरी ख़त" तुम चली तो गई पर दिल ने कभी जाने नहीं दिया तुम को तुम्हारी याद की ज़ंजीरों से खेलता रहता है अब क्या करूँंँ दिल तो नादान है मिरा एक ही ज़िद पे अड़ा है अब भी तुम्हें पाने की सिर्फ़ तुम्हारे सभी ख़त को महफूज़ रखा है मैं ने मोहब्बत की तरह के वो ख़त नहीं है बल्कि मिरी ज़िन्दगी हैं के अब उन के सहारे ही बसर करनी पड़ेगी मुझ को तुम नहीं तो तुम्हारी याद दिलाती हुई हर चीज़ महफूज़ हैं सब पास मिरे वो दिन जब तुम्हें पहली दफा देखा था मिरे दिल ने आज भी वो याद है जो देखते ही काइल हो गया तुम्हारी सादगी़ का, हुस्न का, लफ़्ज़ों का और हो गई तुम सेे मोहब्बत वो भी इतनी के बयाँँ भी न कर पाऊंँ तुम्हारे सभी ख़त को मैं रोज़ पढ़ता हूँ उन दिनों को याद में लाता हूँ जब हम साथ थे उस जगह मैं आज भी जाता हूँ जहाँँ तुम दिखा करती थी मुझ को मैं वहाँँ भी जाता हूँ जहाँँ रोज़ मैं बातें किया करता था तुम सेे ख़यालों में कभी कौल पे पर एक ख़याल मुझे हर बार सता देता है फिर बा'द में आके रुला देता है कमज़ोर किए देता है के अब हम साथ नहीं है के तुम अब दूर हो मुझ सेे वो भी मेरी वजह से के मैं तुम को समझ ना सका तेरी ख़मोशी को सुन ना सका मैं तुम सेे मोहब्बत भी न कर पाया सो जिस का अफ़सोस रहेगा मुझे पर, तुम अब वापस नहीं आना के मैं जान गया हूँ मैं तुम्हारी मोहब्बत के मुक़ाबिल नहीं हूँ तुम मिरे साथ ख़ुशी से नहीं रह पाओगी पर अब कभी तुम मिलो मुझ सेे तो मुझे दोस्त समझकर ही मिलना के मुझ में जो धड़कता था तुम्हारे लिए उस दिल को दफना दिया है मैं ने मिरे अंदर जो इश्क़ था दार पे लटका दिया है मैं ने और अब मेरी जानिब से तुम्हारे लिए ये आख़िरी ख़त है जिसे नज़्म बना कर तुम्हें पहुंँचा रहा हूँ तुम्हारी बद दुआ को मैं ने सलामत रखा है कर सको मुझ को अगर माफ तो कर देना तुम मैं ने ग़ज़लों में सभी, बे-वफ़ा खुदको कहा है तुम्हें जब भी कहा है, अपनी मोहब्बत कहा है

Faiz Ahmad

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"सुना है" सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है सुना है शे'र का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करता दरख़्तों की घनी छाँव में जा कर लेट जाता है हवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैं तो मैना अपने बच्चे छोड़ कर कव्वे के अंडों को परों से थाम लेती है सुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो सारा जंगल जाग जाता है सुना है जब किसी नद्दी के पानी में बए के घोंसले का गंदुमी रंग लरज़ता है तो नद्दी की रुपहली मछलियाँ उस को पड़ोसन मान लेती हैं कभी तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तो किसी लकड़ी के तख़्ते पर गिलहरी, साँप, बकरी और चीता साथ होते हैं सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है ख़ुदावंदा! जलील ओ मो'तबर! दाना ओ बीना! मुंसिफ़ ओ अकबर! मेरे इस शहर में अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िज़ कर!

Zehra Nigaah

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"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म

Tehzeeb Hafi

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

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दामन-ए-लाला-ज़ार में आलम-ए-पुर-बहार देख कल्ला-ए-कोहसार पर जल्वा-ए-ज़र-निगार देख आब-ए-रवाँ की बात क्या ख़ाक पे है निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख देख नशात बाग़ में जल्वा-ए-सुब्ह का समाँ कैफ़ ओ नशात है ज़मीं नूर ओ सुरूर आसमाँ आह ये मंज़र-ए-जमील हाए ये जाँ-फ़ज़ा समाँ औज-ए-फ़लक से है रवाँ नूर का आबशार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख धार के कश्तियों का रूप ''डल'' पे रवाँ है ज़िंदगी चार तरफ़ फ़ज़ाओं में इत्र-फ़शाँ है ज़िंदगी बाद-ए-दज़ां है ज़िंदगी शोला-ब-जाँ है ज़िंदगी चर्ख़-ए-तख़य्युलात पर काहकशाँ है ज़िंदगी चेहरा-ब-चेहरा रू-ब-रू हुस्न का ये निखार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख ख़्वाह ''वुलर'' की झील है ख़्वाह फ़ज़ा-ए-पहल-गाम एक से बढ़ के एक है जो भी नज़र में है मक़ाम देख कि उन फ़ज़ाओं में फूल शराब के हैं जाम घास है फ़र्श-ए-मख़मलीं ज़र्रे हैं आसमाँ-मक़ाम और नहीं तुझे नसीब एक भी लम्हे का क़याम मौज-ए-नसीम-ए-सुब्ह से राज़ ये आश्कार देख ऐ दिल-ए-बे-क़रार देख

Jagan Nath Azad

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फ़ासले की तो ख़ैर बात है और हैदराबाद दिल से दूर नहीं दिल्ली में यूँँ ज़बान पे आई दकन की बात सहरा में छेड़ देवे कोई जैसे चमन की बात बज़्म-ए-ख़िरद में छिड़ तो गई है दकन की बात अब इश्क़ ले के आएगा दार-ओ-रसन की बात इक हुस्न-ए-दकन था जो निगाहों से न छूटा हर हुस्न को वर्ना ब-ख़ुदा छोड़ गए हम 'आज़ाद' एक पल भी न दिल को सकूँ मिला रस्ते में दकन भी था कहीं लखनऊ के बा'द 'आज़ाद' फिर दकन का समुंदर है रू-ब-रू ले जा दिल-ओ-नज़र का सफ़ीना सँभाल कर

Jagan Nath Azad

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वो ख़ाक बोए थे हालात ने शरर जिस में अब उस में फूल तमन्ना के खिलने वाले हैं हुए थे जिन के सबब चाक चाक सीना-ए-दिल वो चाक अब उन्हीं हाथों से सिलने वाले हैं जो दोस्त उलझे थे आपस में दुश्मनों की तरह फिर एक बार वो आपस में मिलने वाले हैं दयारए-रूस हमारा सलाम-ए-जाँ हो क़ुबूल कि राह-ए-शौक़ को आसाँ बना दिया तू ने ये दौर आज का तो मोजज़ों का दौर नहीं मगर वो मोजज़ा हम को दिखा दिया तू ने कि जिस से दूर ओ क़रीब एक नूर फैल गया चराग़-ए-कुश्ता को ऐसे जला दिया तू ने ये ताशकंद से पैग़ाम-ए-दिल-नवाज़ आया कि इब्तिला का ज़माना गुज़र गया यारो! बहुत रहा जिसे दावा-ए-साहिल-आशूबी सुना ये है कि वो दरिया उतर गया यारो! कुछ इस तरह से किसी ने दिया लहू अपना कि अर्ज़-ए-शर्क़ का चेहरा निखर गया यारो! वो ख़ाक जिस पे मिरे रहनुमा ने जाँ दी है मिरा सलाम उसी दिल-नवाज़ ख़ाक के नाम नवा-ए-ख़ामा हो मंसूब आज से प्यारो शहीद-ए-अम्न की रूदाद-ए-ताबनाक के नाम मिरे जुनून-ए-वफ़ा का यही पयाम है आज सुख़नवरान-ओ-अदीबान-ए-हिन्द-ओ-पाक के नाम

Jagan Nath Azad

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