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इस तरह आज फिर आबाद है वीराना-ए-दिल कि है लबरेज़ मय-ए-शौक़ से पैमाना-ए-दिल दिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़र चश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिल आज शम्ओं से ये कह दो कि ख़बर-दार रहें आज बेदार है ख़ाकिस्तर-ए-परवाना-ए-दिल इस को है एक फ़क़त देखने वाला दरकार तूर से कम तो नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल जाग भी ख़्वाब से ऐ मशरिक़ ओ मग़रिब के हकीम कि तिरे वास्ते लाया हूँ मैं नज़राना-ए-दिल ये ज़रा देख कि आए हैं कहाँ से दोनों दिल तिरी ख़ाक का दीवाना मैं दीवाना-ए-दिल शौक़ की राह में इक सख़्त मक़ाम आया है मिरा टूटा हुआ दिल ही मिरे काम आया है साक़ी-ए-जाँ तिरे मय-ख़ाने का इक रिंद-ए-हक़ीर मिस्ल-ए-बू तोड़ के हर क़ैद-ए-मक़ाम आया है अल्लाह अल्लाह तिरी बज़्म का ये आलम-ए-कैफ़ मेरे हाथों में छलकता हुआ जाम आया है तिरे नाम आज ज़माने के महकते हुए फूल 'ग़ालिब' ओ 'मीर' के गुलशन का सलाम आया है वो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलील कितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया है तुझ को भी दिल में बसाया है जो 'इक़बाल' के साथ तो कहीं जा के ये अंदाज़-ए-कलाम आया है क्यूँँ तुझे ये अबदी नींद पसंद आई है ऐ कि हर लफ़्ज़ तिरा शान-ए-मसीहाई है साक़ी-ए-मय-कदा-ए-ज़ीस्त ज़रा आँख तो खोल तिरी तुर्बत पे सियह मस्त घटा छाई है जाग भी ख़्वाब से दिल-दादा-ए-गुलज़ार-ओ-चमन कि तिरे देस की बाग़ों पे बहार आई है जो तिरे घर में है आज उस चमनिस्ताँ को तो देख ज़र्रे ज़र्रे को जुनून-ए-चमन-आराई है 'हाथवे' का है मकाँ वो कि ''मक़ाम-ए-नौ'' है जो भी ख़ित्ता है वो इक पैकर-ए-ज़ेबाई है कुछ ख़बर भी है कि ऐवाँ की हसीं मौजों में जो तिरे दौर में थी अब भी वो रा'नाई है वो तिरा नग़्मा कि सीनों में तपाँ आज भी है अहल-ए-एहसास का सरमाया-ए-जाँ आज भी है रिंद हैं मशरिक़ ओ मग़रिब में उसी के मुश्ताक़ वो तिरा बादा-ए-कोहना कि जवाँ आज भी है आज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्र विर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी है आज से चार सदी क़ब्ल जो चमका था कभी तिरे नग़्मात में वो सोज़-ए-निहाँ आज भी है जिस में है बादा जुनूँ का भी मय-ए-होश के साथ तिरे हाथों में वही रत्ल-ए-गिराँ आज भी है तू ने तमसील के जादे पे दिखाया जो कभी वही मील और वही संग-ए-निशाँ आज भी है ज़ुल्मत-ए-दहर की रातों में सहर-बार है तू ज़ीस्त इक क़ाफ़िला है क़ाफ़िला-सालार है तू तू हर इक दौर में है दीदा-ए-बीना की तरह हर ज़माने में दिल-ए-ज़िंदा-ओ-बेदार है तू जिस की बातों में धड़कता है दिल-ए-अस्र-ए-रवाँ आज तमसील-ए-ज़माना का वो किरदार है तू क्यूँँ न हो लौह ओ क़लम को तिरे उस्लूब पे नाज़ हसन-ए-गुफ़्तार है गंजीना-ए-अफ़्कार है तू बज़्म-ए-जानाँ हो तो अंदाज़ तिरा फूल की शाख़ ज़ुल्म के सामने शमशीर-ए-जिगर-दार है तो तू किसी मुल्क किसी दौर का फ़नकार नहीं बल्कि हर मुल्क का हर दौर का फ़नकार है तू

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है

Yasra rizvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती

Tehzeeb Hafi

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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ज़र्रे ज़र्रे पे बिजली सी बरसा गईं चलते चलते जो पंखा ज़रा रुक गया जिस को भी छू लिया उस को गरमा गईं झट पसीने का दरिया सा बहने लगा गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं ठंडी ठंडी हवाओं का मौसम गया गर्म पानी है कोई पिए किस तरह काली काली घटाओं का मौसम गया और न पानी पिए तो जिए किस तरह गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में पाँव मिट्टी पे जो पड़ गया लीजिए घर में बाहरस बर्फ़ आ गई धूप में क्या रखा आग पर रख दिया सारे बच्चों में पैदा हुई खलबली गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं धूप में घर से बाहर न जाए कोई बर्फ़ वाली कटोरी जो मुँह से लगी जान कर लू का झोंका न खाए कोई सच ये है जान में जान ही आ गई गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं मेज़ भी गर्म है खाट भी गर्म है फ़र्श भी गर्म है टाट भी गर्म है गर्मियाँ आ गईं गर्मियाँ आ गईं

Jagan Nath Azad

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रात फिर तेरे ख़यालों ने जगाया मुझ को टिमटिमाती हुई यादों का ज़रा सा शो'ला आज भड़का तो फिर इक शोला-ए-जव्वाला बना अक़्ल ने तुझ को भुलाने के किए लाख जतन ले गए मुझ को कभी मिस्र के बाज़ारों में कभी इटली कभी एस्पेन के गुलज़ारों में बेल्जियम के, कभी हॉलैंड के मय-ख़ानों में कभी पैरिस, कभी लंदन के सनम-ख़ानों में और मैं अक़्ल की बातों में कुछ ऐसा आया मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद दिल ने तो मुझ से कई बार कहा वहम है ये इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं मैं मगर वहम में कुछ ऐसा गिरफ़्तार रहा मैं ये समझा कि तुझे भूल चुका हूँ शायद कल मगर फिर तिरी आवाज़ ने तड़पा ही दिया आलम-ए-ख़्वाब से गोया मुझे चौंका ही दिया और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था तिरी ज़ुल्फ़ें, तिरी ज़ुल्फ़ों की घटाओं का समाँ तिरी चितवन, तिरी चितवन वही बातिन का सुराग़ तिरे आरिज़ वही ख़ुश-रंग महकते हुए फूल तिरी आँखें वो शराबों के छलकते हुए जाम तिरे लब जैसे सजाए हुए दो बर्ग-ए-गुलाब तिरी हर बात का अंदाज़ तिरी चाल का हुस्न तिरे आने का नज़ारा तिरे जाने का समाँ तिरा हर नक़्श तो क्या तू ही मिरे सामने थी दिल ने जो बात कई बार कही थी मुझ से शब के अनवार में भी दिन के अँधेरों में भी मिरे एहसास में अब गूँज रही थी पैहम इस तरह तुझ को भुलाना कोई आसान नहीं दिल हक़ीक़त है कोई ख़्वाब-ए-परेशाँ तो नहीं याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं डूबती ये नहीं हॉलैंड के मय-ख़ानों में गुम नहीं होती ये पैरिस के सनम-ख़ानों में ये भटकती नहीं एस्पेन के गुलज़ारों में भूलती राह नहीं मिस्र के बाज़ारों में याद मानिंद-ए-ख़िरद मस्लहत-अंदेश नहीं अक़्ल अय्यार है सौ भेस बना लेती है याद का आज भी अंदाज़ वही है कि जो था आज भी उस का है आहंग वही रंग वही भेस है उस का वही तौर वही ढंग वही फिर इसी याद ने कल रात जगाया मुझ को और फिर तेरा हर इक नक़्श मिरे सामने था

Jagan Nath Azad

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अस्सलाम ऐ अज़्मत-ए-हिन्दोस्ताँ की यादगार ऐ शहंशाह-ए-दयार-ए-दिल फ़क़ीर-ए-बे-दयार आज पहली बार तेरी क़ब्र पर आया हूँ मैं बे-नवा हूँ नज़्र को बे-लौस दिल लाया हूँ मैं गर्दिश-ए-तक़दीर के हाथों वतन से दूर हूँ एक बुलबुल हूँ मगर सेहन-ए-चमन से दूर हूँ शौक़ आज़ादी का मुझ को खींच लाया है यहाँ आज दुश्मन है ज़मीं मेरी अदू है आसमाँ मैं भी हूँ अपने वतन से दूर तू भी दूर है हाँ रज़ा-ए-पाक-ए-यज़्दाँ को यही मंज़ूर है मेरा दामन भी यहाँ की ख़ाक से आलूदा है फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है मैं आवारा तू आसूदा है ऐ शह-ए-ख़्वाबीदा ऐ तक़दीर-ए-बेदार-ए-वतन आइना मेरी निगाहों पर है ओ बार-ए-वतन मेरे दिल को याद है अब तक वो सत्तावन की जंग जिस के बा'द इस सर ज़मीं पे छा गए अहल-ए-फ़रंग मेरी नज़रों में है मेरठ और देहली का ज़वाल जानता हूँ मैं जो था झांसी की रानी का मआल मैं नहीं भूला अभी अंजाम-ए-नाना-फ़रनवीस है नज़र में कोशिश-ए-नाकाम-ए-नाना-फ़रनवीस दास्ताँ जैसे भी हो गुज़री वो सब मालूम है तेरे दिल-बन्दों पे जो गुज़री वो सब मालूम है ये वतन रौंदा है जिस को मुद्दतों अग़्यार ने जिस पे ढाए ज़ुल्म लाखों चर्ख़-ए-ना-हंजार ने जिस को रक्खा मुद्दतों क़िस्मत ने ज़िल्लत-आश्ना जिस ने हर पहलू में देखी पस्तियों की इंतिहा आज फिर उस मुल्क में इक ज़िंदगी की लहर है ख़ाक से अफ़्लाक तक ताबिंदगी की लहर है आज फिर इस मुल्क के लाखों जवाँ बेदार हैं हुर्रियत की राह में मिटने को जो तय्यार हैं आज फिर है बे-नियाम इस मुल्क की शमशीर देख सोने वाले जाग अपने ख़्वाब की ता'बीर देख इस तरह लरज़े में है बुनियाद-ए-ऐवान-ए-फ़रंग खा चुके हैं मात गोया शीशा-बाज़ान-ए-फ़रंग हुब्ब-ए-क़ौमी के तरानों से हवा लबरेज़ है और तोपों की दनादन से फ़ज़ा लबरेज़ है शोर गीर-ओ-दार का है फिर फ़ज़ाओं में बुलंद आज फिर हिम्मत ने फेंकी है सितारों पर कमंद फिर उमंगें आरज़ूएँ हैं दिलों में बे-क़रार क़ौम को याद आ गया है अपना गुम-गश्ता वक़ार नौजवानों के दिलों में सरफ़रोशी की उमंग इश्क़ बाज़ी ले गया है अक़्ल बेचारी है दंग आज फिर इस देस में झंकार तलवारों की है कुछ निराली कैफ़ियत फिर देस के प्यारों की है जो तवानाई इरादों में है कोहसारों की है ज़र्रे ज़र्रे में निहाँ ताबिंदगी तारों की है ये नज़ारा आह लफ़्ज़ों में समा सकता नहीं आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं फ़त्ह-ए-नुसरत की दु'आओं से हुआ मा'मूर है नारा-ए-जय-हिंद से सारी फ़ज़ा मा'मूर है मुझ को ऐ शाह-ए-वतन अपने इरादों की क़सम जिन के सर काटे गए इन शाह-ज़ादों की क़सम तेरे मरक़द की मुक़द्दस ख़ाक की मुझ को क़सम मैं जहाँ हूँ उस फ़ज़ा-ए-पाक की मुझ को क़सम अपने भूके जाँ-ब-लब बंगाल की मुझ को क़सम हाकिमों के दस्त-परवर काल की मुझ को क़सम लाल-क़िले के ज़वाल ओ शहर-ए-देहली की क़सम मोहसिन-ए-देहली मआल-ए-शहर-ए-देहली की क़सम मैं तिरी खोई हुई अज़्मत को वापस लाऊँगा और तिरे मरक़द पे नुसरत-याब हो कर आऊँगा तेग़-ए-हिन्दी जिस का लोहा मानता है इक जहाँ जिस की तेज़ी की गवाही दे रहा है आसमाँ तेग़-ए-हिन्दी जिस को मैं ने कर दिया है बे-नियाम जिस का शेवा हुर्रियत-केशी जहाँगीरी है काम जिस ने पूरी मुंसिफ़ी की आज तक दुनिया के साथ ज़ुल्म की दुश्मन है जो इक ज़ुल्म-ए-बे-पर्दा के साथ हर क़दम पर जिस ने बातिल को मिलाया ख़ाक में जिस के साखों की अभी तक गूँज है अफ़्लाक में आज फिर अपनी नज़र जिस की चमक से ख़ीरा है जिस की ताबानी से रौशन इक जहान-ए-तीरा है इक जज़ीरे के हसीं साहिल से जब टकराएगी चैन से मुझ को भड़कती आग में नींद आएगी

Jagan Nath Azad

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मैं इस ख़याल में था बुझ चुकी है आतिश-ए-दर्द भड़क रही थी मिरे दिल में जो ज़माने से मैं इस ख़याल में था हो चुकी है आग वो सर्द वो एक शोला-ए-दर्द-आफ़रीं मता-ए-हयात मैं इस ख़याल में था मैं उसे बचा न सका गुमाँ ये था कि वो इक शोला-ए-हयात-अफ़रोज़ हवा-ए-पैरिस-ओ-लंदन की ताब ला न सका मैं सोचता था कि शायद भुला चुका हूँ तुझे जो अपने दिल की कहानी तुझे सुनाना थी वो अपने साज़-ए-ग़ज़ल पर सुना चुका हूँ तुझे कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है ज़माना वक़्त के पर्दे पे हर घड़ी शायद नया तिलिस्म नई दिलकशी सजाता है जो हैं रफ़ीक़-ए-दिल-ओ-जान उन आँसुओं की क़सम तिरे हुज़ूर अभी तक जो बार पा न सके जिन्हें है तुझ से सिवा तिरी आबरू का ख़याल जो दिल में रुक न सके और मिज़ा तक आ न सका मिला हूँ आज मैं तुझ से तो वसवसे ये तमाम मिटे ख़याल की दुनिया से मिस्ल-ए-नक़्श-बर-आब पता चला कि वो शो'ला बुझा नहीं है अभी बस इतनी बात है अब जल रहा है ज़ेर-ए-नक़ाब नक़ाब-ए-वक़्त-ओ-मसाफ़त के दो दबीज़ हिजाब गुज़र गई तिरी फ़ुर्क़त में ज़िंदगी जितनी अदन की सुब्ह कि पैरिस की रात में गुज़री दिल ओ नज़र के किसी वारदात में गुज़री कि इक हसीना-ए-आलम से बात में गुज़री फ़क़त वो एक नदामत है और कुछ भी नहीं और आज मेरी नदामत का ये शदीद एहसास हर एक साँस में मुझ से सवाल करता है हवस है इश्क़ से कितने क़दम? दो-चार क़दम? किया है फ़ासला उन में कई हज़ार क़दम? पिकैडली में भी हम याद थे तुझे कि न थे पिगाल में भी ख़लिश कोई दिल में थी की न थी वो शाम टेम्स की अब भी नज़र में है कि नहीं कि जब हवस की नज़र पर कोई हिजाब न था वो सतह-ए-बहर पे रक़्साँ जहाज़ का अर्शा और उस पे चार तरफ़ एक नूर का आलम कि जैसे बर्क़-ए-तजल्ली-ए-तूर का आलम वेलेंशिया में वो रक़्स-ए-बरहनगी के तिलिस्म तिरी निगाह-ए-तमाशा को कुछ झिजक तो न थी ये इक सवाल कि जिस के हज़ार पहलू हैं मैं एक लम्हे को जब इन पे ग़ौर करता हूँ तो सोचता हूँ की मैं तुझ से अब मलूँ न मलूँ

Jagan Nath Azad

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कितनी रौशन क्यूँँ न हो 'आज़ाद' आख़िर एक दिन शम-ए-हस्ती मौत के झोंकों से गुल हो जाएगी जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार ज़ीस्त आग़ोश-ए-अजल में इस तरह सो जाएगी माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी लेकिन इस ज़ुल्मत-कदे में एक नूर ऐसा भी है गर्दिश-ए-अय्याम जिस के पास आ सकती नहीं एक ऐसा भी है लौह-ए-वक़्त पर नक़्श-ए-दवाम कोई शय भी जिस को आलम से मिटा सकती नहीं मौत झोंके ले के उट्ठे या बगूले ले के आए अज़्मत-ए-किरदार का शो'ला बुझा सकती नहीं

Jagan Nath Azad

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