गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा फ़लक पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सींखा मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री कागा बने हैं शैख़ चिल्ली कबूतर से हुई कचवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी जलेबी तैरती पानी पे आई मज़े ले ले के भिंडी ख़ूब खाई मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरियों ने खोटा पैसा गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध मीठा खा रहे थे फ़लक पर उड़ रहा है एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी सर-ए-राह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक तक गुनगुनाया मज़े से घास बंदर खा रहे थे चबा कर पान कव्वे गा रहे थे अज़ाँ मकड़ी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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मनाता मौज गर चूहा मैं होता सहरस शाम तक फिरता ही रहता लगे जब भूक मैं मीठा चुराता मज़े से बिल में बैठा उस को खाता मोहल्ले के सभी बावर्ची-ख़ाने बुलाएँगे मुझे दावत उड़ाने मज़े से दावतें हर घर में खाता दही मस्का मिलाई दूध उड़ाता अगर बिल्ली चली आए झपट कर तो घुस जाऊँगा मैं बिल दुबक कर मनाता मौज गर मछली मैं होता हमेशा तैरते पानी में रहता मकाँ होता मिरा पानी के अंदर बहुत उजला बहुत अच्छा बड़ा सुंदर मज़े से घूमता धू में मचाता कभी मैं ज़ोर से पानी उड़ाता कभी मैं मेंडकों से छेड़ करता कभी मैं बुलबुले पानी पे लाता शिकारी गर मुझे लेने को आता मैं पानी की तहों में डूब जाता मनाता मौज गर बंदर मैं होता उछलते कूदते बाग़ों में फिरता मज़े से झूलता पेंगें लगाता कभी मैं शाख़ पर ही गुनगुनाता अगर माली मुझे आँखें दिखाता झपट कर उस की मैं पगड़ी उड़ाता उचकते फाँदते बंगलों में जाता मैं बच्चों को सताता मुँह चिढ़ाता किताबें टोपियाँ बस्ते उड़ाता किसी के सर पे फिर चाँटे जमाता मनाता मौज गर होता परिंदा ज़मीं से आसमाँ की सैर करता कभी नीचे से मैं ऊपर को आता जहाँ को शो'बदे अपने दिखाता मज़े से घूमता फिरता हुआ मैं कभी ठोकर नहीं खाता फ़ज़ा में दरख़्तों पर सवेरे चहचहाता ख़ुदा की हम्द मैं हर वक़्त गाता कोई बच्चा पकड़ने को जो आता भला कब उस के मैं हूँ हाथ आता
Vaqar Khaleel
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ख़ुशनुमा है हयात फूलों की देखना काएनात फूलों की जूही चम्पा चमेली और गुलाब नाम बच्चों के ज़ात फूलों की तितलियों की तरह सजल नाज़ुक उन की हर बात बात फूलों की ये नहीं जानते कि ग़म क्या है दिन है फूलों का रात फूलों की वो जो पढ़ते हैं और लिखते हैं और करते हैं बात फूलों की लहलहाता चमन हुजूम-ए-बहार मुस्कुराती है ज़ात फूलों की इल्म की रौशनी के दीप जलें महकी महकी है रात फूलों की नज़्र-ए-‘मख़दूम’ है ग़ज़ल बच्चो शख़्सियत थी हयात फूलों की फूल की तरह मदरसों में 'वक़ार' सज रही है बरात फूलों की
Vaqar Khaleel
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देखो तो इस मोड़ के आगे छोटा सा स्कूल हमारा लंबी सी दीवार के अंदर रंग रंगीला प्यारा प्यारा कितने ही तो फूल खिले हैं पौदे भी क्या ख़ूब लगे हैं घंटी के बजने की सदाएँ हम्द-ए-ख़ुदा फिर रब से दुआएँ हाए यकायक एक धमाका हम सब का दिल दहला जाता काले काले बम के गोले मौत तबाही जंग के शो'ले ज़न ज़न नीचे आ जाते हैं कैसी तबाही फैलाते हैं छत स्कूल की गिर जाती है मेज़ पे मिट्टी भर जाती है और पौदे भी कुम्हला जाते फूल सिसकते आहें भरते शहर में हर सू मौत तबाही जंग के शो'ले हिटलर-शाही गलियाँ सड़कें वीराँ वीराँ जैसे हर शय हैराँ हैराँ अम्मी और अब्बा भी परेशाँ हर-जा मौत का शैताँ रक़्साँ जंग का मतलब आहें आँसू जंग का मतलब ख़ून लहू
Vaqar Khaleel
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ख़ुदा राम है और ख़ुदा ईश्वर वो भगवान है कुल जहाँ उस का घर उसी का करम और उसी की दया ये मकतब ये ता'लीम का हौसला किताबों में वो कार-ख़ानों में वो ज़मीं ही नहीं आसमानों में वो उसी की नवाज़िश का इज़हार हैं जो सर-सब्ज़-ओ-शादाब अश्जार हैं उसी की इनायत चमन रंग-ओ-बू मोहब्बत मसर्रत ख़ुशी जुस्तुजू बुराई से हम को बचाए वही अँधेरे में रस्ता दिखाए वही वो रहमान है और वही है रहीम गुनहगार के हक़ में रब्ब-ए-करीम
Vaqar Khaleel
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ये रहगुज़र रहगुज़ार-ए-ख़ूबाँ है जिस का हर मोड़ कहकशाँ है सजल शगुफ़्ता हसीं दिल-आवेज़ ख़ूब-सूरत बहार सामाँ इधर से गुज़र गया ज़माना कि जैसे गुज़रे रमीदा आहू जिलौ में सुब्हों की मुस्कुराहट लबों पे रौशन सी गुनगुनाहट जबीं पे तक़्दीस-ए-फ़न का क़श्क़ा नज़र नज़र में सहर के ख़ाके लचकती बाहें महकते गेसू सबीह अबरू गुदाज़ बाज़ू क़दम क़दम पर पड़े हैं हल्क़े ठहर ठहर कर बजे हैं घुँघरू ये रहगुज़र रहगुज़ार-ए-ख़ूबाँ है जिस का हर मोड़ कहकशाँ है ये रहगुज़र होश-मंद मेहनत-कशों की दानिश के शाहज़ादों की रहगुज़र है कि जिस का हर मोड़ जेहद-ओ-फ़न की अलामतों का नगर नगर है मिरे रफ़ीक़ो ये रहगुज़र इक नई डगर है ये रहगुज़र फ़हम और बसीरत की रहगुज़र है मगर अभी ज़ुल्फ़ ता-कमर है
Vaqar Khaleel
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