ख़ुदा राम है और ख़ुदा ईश्वर वो भगवान है कुल जहाँ उस का घर उसी का करम और उसी की दया ये मकतब ये ता'लीम का हौसला किताबों में वो कार-ख़ानों में वो ज़मीं ही नहीं आसमानों में वो उसी की नवाज़िश का इज़हार हैं जो सर-सब्ज़-ओ-शादाब अश्जार हैं उसी की इनायत चमन रंग-ओ-बू मोहब्बत मसर्रत ख़ुशी जुस्तुजू बुराई से हम को बचाए वही अँधेरे में रस्ता दिखाए वही वो रहमान है और वही है रहीम गुनहगार के हक़ में रब्ब-ए-करीम
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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मनाता मौज गर चूहा मैं होता सहरस शाम तक फिरता ही रहता लगे जब भूक मैं मीठा चुराता मज़े से बिल में बैठा उस को खाता मोहल्ले के सभी बावर्ची-ख़ाने बुलाएँगे मुझे दावत उड़ाने मज़े से दावतें हर घर में खाता दही मस्का मिलाई दूध उड़ाता अगर बिल्ली चली आए झपट कर तो घुस जाऊँगा मैं बिल दुबक कर मनाता मौज गर मछली मैं होता हमेशा तैरते पानी में रहता मकाँ होता मिरा पानी के अंदर बहुत उजला बहुत अच्छा बड़ा सुंदर मज़े से घूमता धू में मचाता कभी मैं ज़ोर से पानी उड़ाता कभी मैं मेंडकों से छेड़ करता कभी मैं बुलबुले पानी पे लाता शिकारी गर मुझे लेने को आता मैं पानी की तहों में डूब जाता मनाता मौज गर बंदर मैं होता उछलते कूदते बाग़ों में फिरता मज़े से झूलता पेंगें लगाता कभी मैं शाख़ पर ही गुनगुनाता अगर माली मुझे आँखें दिखाता झपट कर उस की मैं पगड़ी उड़ाता उचकते फाँदते बंगलों में जाता मैं बच्चों को सताता मुँह चिढ़ाता किताबें टोपियाँ बस्ते उड़ाता किसी के सर पे फिर चाँटे जमाता मनाता मौज गर होता परिंदा ज़मीं से आसमाँ की सैर करता कभी नीचे से मैं ऊपर को आता जहाँ को शो'बदे अपने दिखाता मज़े से घूमता फिरता हुआ मैं कभी ठोकर नहीं खाता फ़ज़ा में दरख़्तों पर सवेरे चहचहाता ख़ुदा की हम्द मैं हर वक़्त गाता कोई बच्चा पकड़ने को जो आता भला कब उस के मैं हूँ हाथ आता
Vaqar Khaleel
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गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा फ़लक पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सींखा मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री कागा बने हैं शैख़ चिल्ली कबूतर से हुई कचवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी जलेबी तैरती पानी पे आई मज़े ले ले के भिंडी ख़ूब खाई मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरियों ने खोटा पैसा गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध मीठा खा रहे थे फ़लक पर उड़ रहा है एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी सर-ए-राह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक तक गुनगुनाया मज़े से घास बंदर खा रहे थे चबा कर पान कव्वे गा रहे थे अज़ाँ मकड़ी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर
Vaqar Khaleel
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ख़ुशनुमा है हयात फूलों की देखना काएनात फूलों की जूही चम्पा चमेली और गुलाब नाम बच्चों के ज़ात फूलों की तितलियों की तरह सजल नाज़ुक उन की हर बात बात फूलों की ये नहीं जानते कि ग़म क्या है दिन है फूलों का रात फूलों की वो जो पढ़ते हैं और लिखते हैं और करते हैं बात फूलों की लहलहाता चमन हुजूम-ए-बहार मुस्कुराती है ज़ात फूलों की इल्म की रौशनी के दीप जलें महकी महकी है रात फूलों की नज़्र-ए-‘मख़दूम’ है ग़ज़ल बच्चो शख़्सियत थी हयात फूलों की फूल की तरह मदरसों में 'वक़ार' सज रही है बरात फूलों की
Vaqar Khaleel
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देखो तो इस मोड़ के आगे छोटा सा स्कूल हमारा लंबी सी दीवार के अंदर रंग रंगीला प्यारा प्यारा कितने ही तो फूल खिले हैं पौदे भी क्या ख़ूब लगे हैं घंटी के बजने की सदाएँ हम्द-ए-ख़ुदा फिर रब से दुआएँ हाए यकायक एक धमाका हम सब का दिल दहला जाता काले काले बम के गोले मौत तबाही जंग के शो'ले ज़न ज़न नीचे आ जाते हैं कैसी तबाही फैलाते हैं छत स्कूल की गिर जाती है मेज़ पे मिट्टी भर जाती है और पौदे भी कुम्हला जाते फूल सिसकते आहें भरते शहर में हर सू मौत तबाही जंग के शो'ले हिटलर-शाही गलियाँ सड़कें वीराँ वीराँ जैसे हर शय हैराँ हैराँ अम्मी और अब्बा भी परेशाँ हर-जा मौत का शैताँ रक़्साँ जंग का मतलब आहें आँसू जंग का मतलब ख़ून लहू
Vaqar Khaleel
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सड़क पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है कहा मुर्ग़े ने ये गीदड़ से रो कर मिरी मुर्ग़ी अभी उठी है सो कर नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सेंका कबूतर से हुई कछवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरों ने जो खोटा पैसा जलेबी तैरती पानी पे आती मज़े ले ले के वो भिंडी ने खाई गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध खाना खा रहे थे सर-ए-रह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक ने गुनगुनाया फ़लक पर उड़ रहा था एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी अज़ाँ बकरी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री गा गा बने हैं शैख़ चिल्ली मज़े से घास बंदर खा रहा है चबा कर पान कव्वा आ रहा है गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा सदा ये ग़ैब से एक बार आई ज़मीन-ओ-आसमाँ में है लड़ाई
Vaqar Khaleel
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