मनाता मौज गर चूहा मैं होता सहरस शाम तक फिरता ही रहता लगे जब भूक मैं मीठा चुराता मज़े से बिल में बैठा उस को खाता मोहल्ले के सभी बावर्ची-ख़ाने बुलाएँगे मुझे दावत उड़ाने मज़े से दावतें हर घर में खाता दही मस्का मिलाई दूध उड़ाता अगर बिल्ली चली आए झपट कर तो घुस जाऊँगा मैं बिल दुबक कर मनाता मौज गर मछली मैं होता हमेशा तैरते पानी में रहता मकाँ होता मिरा पानी के अंदर बहुत उजला बहुत अच्छा बड़ा सुंदर मज़े से घूमता धू में मचाता कभी मैं ज़ोर से पानी उड़ाता कभी मैं मेंडकों से छेड़ करता कभी मैं बुलबुले पानी पे लाता शिकारी गर मुझे लेने को आता मैं पानी की तहों में डूब जाता मनाता मौज गर बंदर मैं होता उछलते कूदते बाग़ों में फिरता मज़े से झूलता पेंगें लगाता कभी मैं शाख़ पर ही गुनगुनाता अगर माली मुझे आँखें दिखाता झपट कर उस की मैं पगड़ी उड़ाता उचकते फाँदते बंगलों में जाता मैं बच्चों को सताता मुँह चिढ़ाता किताबें टोपियाँ बस्ते उड़ाता किसी के सर पे फिर चाँटे जमाता मनाता मौज गर होता परिंदा ज़मीं से आसमाँ की सैर करता कभी नीचे से मैं ऊपर को आता जहाँ को शो'बदे अपने दिखाता मज़े से घूमता फिरता हुआ मैं कभी ठोकर नहीं खाता फ़ज़ा में दरख़्तों पर सवेरे चहचहाता ख़ुदा की हम्द मैं हर वक़्त गाता कोई बच्चा पकड़ने को जो आता भला कब उस के मैं हूँ हाथ आता
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा फ़लक पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सींखा मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री कागा बने हैं शैख़ चिल्ली कबूतर से हुई कचवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी जलेबी तैरती पानी पे आई मज़े ले ले के भिंडी ख़ूब खाई मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरियों ने खोटा पैसा गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध मीठा खा रहे थे फ़लक पर उड़ रहा है एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी सर-ए-राह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक तक गुनगुनाया मज़े से घास बंदर खा रहे थे चबा कर पान कव्वे गा रहे थे अज़ाँ मकड़ी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर
Vaqar Khaleel
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देखो तो इस मोड़ के आगे छोटा सा स्कूल हमारा लंबी सी दीवार के अंदर रंग रंगीला प्यारा प्यारा कितने ही तो फूल खिले हैं पौदे भी क्या ख़ूब लगे हैं घंटी के बजने की सदाएँ हम्द-ए-ख़ुदा फिर रब से दुआएँ हाए यकायक एक धमाका हम सब का दिल दहला जाता काले काले बम के गोले मौत तबाही जंग के शो'ले ज़न ज़न नीचे आ जाते हैं कैसी तबाही फैलाते हैं छत स्कूल की गिर जाती है मेज़ पे मिट्टी भर जाती है और पौदे भी कुम्हला जाते फूल सिसकते आहें भरते शहर में हर सू मौत तबाही जंग के शो'ले हिटलर-शाही गलियाँ सड़कें वीराँ वीराँ जैसे हर शय हैराँ हैराँ अम्मी और अब्बा भी परेशाँ हर-जा मौत का शैताँ रक़्साँ जंग का मतलब आहें आँसू जंग का मतलब ख़ून लहू
Vaqar Khaleel
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ख़ुशनुमा है हयात फूलों की देखना काएनात फूलों की जूही चम्पा चमेली और गुलाब नाम बच्चों के ज़ात फूलों की तितलियों की तरह सजल नाज़ुक उन की हर बात बात फूलों की ये नहीं जानते कि ग़म क्या है दिन है फूलों का रात फूलों की वो जो पढ़ते हैं और लिखते हैं और करते हैं बात फूलों की लहलहाता चमन हुजूम-ए-बहार मुस्कुराती है ज़ात फूलों की इल्म की रौशनी के दीप जलें महकी महकी है रात फूलों की नज़्र-ए-‘मख़दूम’ है ग़ज़ल बच्चो शख़्सियत थी हयात फूलों की फूल की तरह मदरसों में 'वक़ार' सज रही है बरात फूलों की
Vaqar Khaleel
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ख़ुदा राम है और ख़ुदा ईश्वर वो भगवान है कुल जहाँ उस का घर उसी का करम और उसी की दया ये मकतब ये ता'लीम का हौसला किताबों में वो कार-ख़ानों में वो ज़मीं ही नहीं आसमानों में वो उसी की नवाज़िश का इज़हार हैं जो सर-सब्ज़-ओ-शादाब अश्जार हैं उसी की इनायत चमन रंग-ओ-बू मोहब्बत मसर्रत ख़ुशी जुस्तुजू बुराई से हम को बचाए वही अँधेरे में रस्ता दिखाए वही वो रहमान है और वही है रहीम गुनहगार के हक़ में रब्ब-ए-करीम
Vaqar Khaleel
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सड़क पर रेल तेज़ी से चली है हवा देखो तो पानी से जली है कहा मुर्ग़े ने ये गीदड़ से रो कर मिरी मुर्ग़ी अभी उठी है सो कर नदी में तैरता ख़रगोश देखा तो मछली ने परों को ख़ूब सेंका कबूतर से हुई कछवे की शादी तो भालू ने टमाटर को दुआ दी मचाया शोर कुछ साँपों ने ऐसा चलाया बकरों ने जो खोटा पैसा जलेबी तैरती पानी पे आती मज़े ले ले के वो भिंडी ने खाई गधे साइकल चलाए जा रहे थे मज़े से दूध खाना खा रहे थे सर-ए-रह पिट गई च्यूँँटी बिचारी गिलहरी बन गई अब तो शिकारी थपक कर मैं ने मीठे को जगाया अंधेरे में नमक ने गुनगुनाया फ़लक पर उड़ रहा था एक हाथी मियाँ घोड़े चले हैं बन के साथी अज़ाँ बकरी ने दी नद्दी पे जा कर मियाँ मच्छर निकल आए नहा कर मिली चूहे के बिल से एक बिल्ली श्री गा गा बने हैं शैख़ चिल्ली मज़े से घास बंदर खा रहा है चबा कर पान कव्वा आ रहा है गिरा पानी के नल से एक अण्डा तो ख़रबूज़ा उठा फिर ले के डंडा सदा ये ग़ैब से एक बार आई ज़मीन-ओ-आसमाँ में है लड़ाई
Vaqar Khaleel
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