nazmKuch Alfaaz

"इक शख़्स" थोड़ा बेचैन है और आँखों में भी पानी है देखो इस शख़्स को भी कोई परेशानी है जो पसंद आता था अब उस सेे ही डर जाता है जानते हो ये किसी नाम से घबराता है इक इसी नाम ने बर्बाद किया था उस को आज बस इस लिए ही याद किया था उस को नींद फिर कैसे लगे जाए भी क्यूँ सोने वो याद जो कर लिया तो लग गया है रोने वो रात भर रोएगा अब सुर्ख़ पड़े नैन से वो माँ तो समझेगी कि सोया है बड़े चैन से वो माँ की ख़ातिर ही तो मुॅंह छुप गया था चादर से जाने पर किस लिए अब उठ गया है बिस्तर से या'नी अब ऐसा कोई काम करेगा लड़का अपने घर वालों को बदनाम करेगा लड़का काम जो करना है उस काम से घबराया है शाम को इस लिए मय-ख़ाने से हो आया है ज़िक्र कर आया था इस काम का मय-ख़ाने में कोई शय खोज रहा इस लिए तह-ख़ाने में किसी आवाज़ बिना होगा तमाशा ऐसा शोर करता नहीं हथियार तलाशा ऐसा ख़ुश तो है हाथ में रस्सी लिए मन अब उस का काँपने लग गया है पर ये बदन अब उस का मुस्कुरा कर मगर कहता है कि सुन बात मिरी अलविदा हँस के ही कर आख़िरी है रात मिरी या'नी अब ज़िंदगी का आख़िरी दम आ गया है आगे बस मौत ही है ऐसा क़दम आ गया है कँपकँपाते लबों से नाम वही जाप रहा आँखें छत देख रही हाथ गला नाप रहा नाम अब उस के गले में ही अटक जाएगा देखते देखते वो छत से लटक जाएगा क्यूँ भला इतना है अफ़सुर्दा वो भी मेरी तरह होना क्यूँ चाहता है मुर्दा वो भी मेरी तरह मुझ सा क्यूँ दिख रहा है मुझ को हर इक मायने में मुझ को ये शख़्स ही क्यूँ दिख रहा है आइने में

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"ख़त" तुम को ये बताना था या फिर ये समझाना था दिल की बस ये चाहत थी बस तुम पर प्यार लुटाना था तुम को ये बताना था था छेड़ना तुम को थोड़ा थोड़ा तुम्हें सताना था जो रूठ जाते तुम मुझ सेे हाँ मुझ को तुम्हें मनाना था फिर तुम को गले लगाना था तुम को ये बताना था लड़ के भी तुम सोते तो तुम्हारा सिर सहलाना था मक़्सद सिर्फ़ एक था तुम्हारा प्यार कमाना था सारी दुनिया मिट्टी है तुम्हारा साथ ख़ज़ाना था तुम को ये बताना था मिलने तुम सेे आना था या फिर तुम्हें बुलाना था माँग तुम्हारी भरनी थी अपना तुम्हें बनाना था तुम्हारा ही कहलाना था तुम को ये बताना था इस जीवन का हर मंज़र तुम्हारे साथ बिताना था हर फेरे का हर वा'दा तुम्हारे साथ निभाना था मंगलसूत्र इन हाथों से तुम को ही पहनाना था तुम को ये बताना था फ़ासले जितने भी थे उन को मुझे मिटाना था उस ख़ुदा से हर जन्म में तुम्हारा साथ लिखाना था फिर बारात तुम्हारी चौखट पर तुम सेे ही ब्याह रचाना था तुम को ये बताना था बिन बोले बस चुपके से गजरा तुम्हें दिलाना था बनाता मैं एक दिन खाना फिर खाना तुम्हें खिलाना था तुम्हारे हाथों से खाना मुझ को भी तो खाना था तुम को ये बताना था खो दिया तुम को मैं ने ये दुख अब मुझे मनाना था डूब जाता आसमान बस आँसू मुझे बहाना था फिर लिख दिया मैं ने आँसू बस इतना मेरा फ़साना था तुम को ये बताना था बस तुम को ये बताना था

Divya 'Kumar Sahab'

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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"हसरत-ए-वस्ल" ये तेरा और मेरा मिलना सब को खल जाए तू मिलना ऐसे कि हर कोई मुझ सेे जल जाए तू मुझ को रख ले अगर मिलने आऊॅं तेरे घर फिर आब-ओ-दाना मेरा तेरे घर से चल जाए तुझी से मिलने के ख़ातिर सॅंवर रही हूँ मैं ये पहली बार है तो थोड़ा डर रही हूँ मैं दुपट्टा बाँधने वाली ने रक्खा है पल्लू ये देख तेरे लिए क्या क्या कर रही हूँ मैं मेरी पसंद की इक बात तुझ सेे कहनी थी सो तेरे शहर में तेरी पसंद पहनी है मैं चाहती हूँ ये पल मुझ को याद रह जाए तो हाथ थाम के कह दूँ जो बात कहनी है तू मेरे दिल पे तेरे इश्क़ का नक़ाब लगा मैं लुट भी जाने को राज़ी हूँ तू हिसाब लगा पसंद है मुझे बस तेरे हाथ से सब कुछ मैं चाहती हूँ तू इन बालों में गुलाब लगा

Bhuwan Singh

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"इंतिज़ार" जान तो गया हूँ मैं कुछ नहीं तिरे मन में जान तो गया है तू बस तू है मिरे मन में क्या ये मेरी ग़लती है पहली मर्तबास ही इश्क़ हो गया मुझ को अपने आश्ना से ही क्या करूँ बता मुझ को तेरा ही दिवाना हूँ तू नए का शाइक़ है और मैं पुराना हूँ रोज़-ओ-शब नए लोगों से मिला करेगा तू मेरा दिल जलाने को और क्या करेगा तू चाहने का वा'दा है वादें को निभाऊँगा दिल की राख से तेरी राह को सजाऊँगा ख़ूब ख़ुश रहेगा तू फिर जहाँ-कहीं होगा इतना जानता हूँ मैं तू मिरा नहीं होगा फिर भी उम्र भर तेरा इंतिज़ार करना है तुझ सेे प्यार करता हूँ तुझ सेे प्यार करना है

Bhuwan Singh

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चाय लम्हा लम्हा सोते जागते सवार रहता है ज़ेहन-ओ-दिल में रोज़-ओ-शब बस इक ख़ुमार रहता है हर हवस से इश्क़ से जुनून से ज़ियादा है कुछ मेरी रगों में मेरे ख़ून से ज़ियादा है इस क़दर मैं मुंतज़िर हूँ उस की एक दीद का गोया रोज़ करता हूँ मैं इंतिज़ार ईद का दर्द-ओ-ग़म को उस सेे कोई एतिराज़ भी नहीं दुनिया में तो उस के जैसा चारासाज़ भी नहीं साथ उसी का है बदलते मौसमों की फ़िक्र में नाम उसी का लेता हूँ मेरे सुकूँ के ज़िक्र में ज़िंदा रह तो सकता हूँ मैं आब-ओ-दाना छोड़कर जी नहीं सकूँगा पर मैं उस सेे रिश्ता तोड़कर उस का रूप सीना चीर के दिखा भी सकता हूँ कोसों दूर चाय के लिए मैं जा भी सकता हूँ

Bhuwan Singh

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