"हसरत-ए-वस्ल" ये तेरा और मेरा मिलना सब को खल जाए तू मिलना ऐसे कि हर कोई मुझ सेे जल जाए तू मुझ को रख ले अगर मिलने आऊॅं तेरे घर फिर आब-ओ-दाना मेरा तेरे घर से चल जाए तुझी से मिलने के ख़ातिर सॅंवर रही हूँ मैं ये पहली बार है तो थोड़ा डर रही हूँ मैं दुपट्टा बाँधने वाली ने रक्खा है पल्लू ये देख तेरे लिए क्या क्या कर रही हूँ मैं मेरी पसंद की इक बात तुझ सेे कहनी थी सो तेरे शहर में तेरी पसंद पहनी है मैं चाहती हूँ ये पल मुझ को याद रह जाए तो हाथ थाम के कह दूँ जो बात कहनी है तू मेरे दिल पे तेरे इश्क़ का नक़ाब लगा मैं लुट भी जाने को राज़ी हूँ तू हिसाब लगा पसंद है मुझे बस तेरे हाथ से सब कुछ मैं चाहती हूँ तू इन बालों में गुलाब लगा
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"इक शख़्स" थोड़ा बेचैन है और आँखों में भी पानी है देखो इस शख़्स को भी कोई परेशानी है जो पसंद आता था अब उस सेे ही डर जाता है जानते हो ये किसी नाम से घबराता है इक इसी नाम ने बर्बाद किया था उस को आज बस इस लिए ही याद किया था उस को नींद फिर कैसे लगे जाए भी क्यूँ सोने वो याद जो कर लिया तो लग गया है रोने वो रात भर रोएगा अब सुर्ख़ पड़े नैन से वो माँ तो समझेगी कि सोया है बड़े चैन से वो माँ की ख़ातिर ही तो मुॅंह छुप गया था चादर से जाने पर किस लिए अब उठ गया है बिस्तर से या'नी अब ऐसा कोई काम करेगा लड़का अपने घर वालों को बदनाम करेगा लड़का काम जो करना है उस काम से घबराया है शाम को इस लिए मय-ख़ाने से हो आया है ज़िक्र कर आया था इस काम का मय-ख़ाने में कोई शय खोज रहा इस लिए तह-ख़ाने में किसी आवाज़ बिना होगा तमाशा ऐसा शोर करता नहीं हथियार तलाशा ऐसा ख़ुश तो है हाथ में रस्सी लिए मन अब उस का काँपने लग गया है पर ये बदन अब उस का मुस्कुरा कर मगर कहता है कि सुन बात मिरी अलविदा हँस के ही कर आख़िरी है रात मिरी या'नी अब ज़िंदगी का आख़िरी दम आ गया है आगे बस मौत ही है ऐसा क़दम आ गया है कँपकँपाते लबों से नाम वही जाप रहा आँखें छत देख रही हाथ गला नाप रहा नाम अब उस के गले में ही अटक जाएगा देखते देखते वो छत से लटक जाएगा क्यूँ भला इतना है अफ़सुर्दा वो भी मेरी तरह होना क्यूँ चाहता है मुर्दा वो भी मेरी तरह मुझ सा क्यूँ दिख रहा है मुझ को हर इक मायने में मुझ को ये शख़्स ही क्यूँ दिख रहा है आइने में
Bhuwan Singh
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चाय लम्हा लम्हा सोते जागते सवार रहता है ज़ेहन-ओ-दिल में रोज़-ओ-शब बस इक ख़ुमार रहता है हर हवस से इश्क़ से जुनून से ज़ियादा है कुछ मेरी रगों में मेरे ख़ून से ज़ियादा है इस क़दर मैं मुंतज़िर हूँ उस की एक दीद का गोया रोज़ करता हूँ मैं इंतिज़ार ईद का दर्द-ओ-ग़म को उस सेे कोई एतिराज़ भी नहीं दुनिया में तो उस के जैसा चारासाज़ भी नहीं साथ उसी का है बदलते मौसमों की फ़िक्र में नाम उसी का लेता हूँ मेरे सुकूँ के ज़िक्र में ज़िंदा रह तो सकता हूँ मैं आब-ओ-दाना छोड़कर जी नहीं सकूँगा पर मैं उस सेे रिश्ता तोड़कर उस का रूप सीना चीर के दिखा भी सकता हूँ कोसों दूर चाय के लिए मैं जा भी सकता हूँ
Bhuwan Singh
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"इंतिज़ार" जान तो गया हूँ मैं कुछ नहीं तिरे मन में जान तो गया है तू बस तू है मिरे मन में क्या ये मेरी ग़लती है पहली मर्तबास ही इश्क़ हो गया मुझ को अपने आश्ना से ही क्या करूँ बता मुझ को तेरा ही दिवाना हूँ तू नए का शाइक़ है और मैं पुराना हूँ रोज़-ओ-शब नए लोगों से मिला करेगा तू मेरा दिल जलाने को और क्या करेगा तू चाहने का वा'दा है वादें को निभाऊँगा दिल की राख से तेरी राह को सजाऊँगा ख़ूब ख़ुश रहेगा तू फिर जहाँ-कहीं होगा इतना जानता हूँ मैं तू मिरा नहीं होगा फिर भी उम्र भर तेरा इंतिज़ार करना है तुझ सेे प्यार करता हूँ तुझ सेे प्यार करना है
Bhuwan Singh
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