"इंतिज़ार" जान तो गया हूँ मैं कुछ नहीं तिरे मन में जान तो गया है तू बस तू है मिरे मन में क्या ये मेरी ग़लती है पहली मर्तबास ही इश्क़ हो गया मुझ को अपने आश्ना से ही क्या करूँ बता मुझ को तेरा ही दिवाना हूँ तू नए का शाइक़ है और मैं पुराना हूँ रोज़-ओ-शब नए लोगों से मिला करेगा तू मेरा दिल जलाने को और क्या करेगा तू चाहने का वा'दा है वादें को निभाऊँगा दिल की राख से तेरी राह को सजाऊँगा ख़ूब ख़ुश रहेगा तू फिर जहाँ-कहीं होगा इतना जानता हूँ मैं तू मिरा नहीं होगा फिर भी उम्र भर तेरा इंतिज़ार करना है तुझ सेे प्यार करता हूँ तुझ सेे प्यार करना है
Related Nazm
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
161 likes
मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
78 likes
क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
42 likes
"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
47 likes
More from Bhuwan Singh
"हसरत-ए-वस्ल" ये तेरा और मेरा मिलना सब को खल जाए तू मिलना ऐसे कि हर कोई मुझ सेे जल जाए तू मुझ को रख ले अगर मिलने आऊॅं तेरे घर फिर आब-ओ-दाना मेरा तेरे घर से चल जाए तुझी से मिलने के ख़ातिर सॅंवर रही हूँ मैं ये पहली बार है तो थोड़ा डर रही हूँ मैं दुपट्टा बाँधने वाली ने रक्खा है पल्लू ये देख तेरे लिए क्या क्या कर रही हूँ मैं मेरी पसंद की इक बात तुझ सेे कहनी थी सो तेरे शहर में तेरी पसंद पहनी है मैं चाहती हूँ ये पल मुझ को याद रह जाए तो हाथ थाम के कह दूँ जो बात कहनी है तू मेरे दिल पे तेरे इश्क़ का नक़ाब लगा मैं लुट भी जाने को राज़ी हूँ तू हिसाब लगा पसंद है मुझे बस तेरे हाथ से सब कुछ मैं चाहती हूँ तू इन बालों में गुलाब लगा
Bhuwan Singh
1 likes
"इक शख़्स" थोड़ा बेचैन है और आँखों में भी पानी है देखो इस शख़्स को भी कोई परेशानी है जो पसंद आता था अब उस सेे ही डर जाता है जानते हो ये किसी नाम से घबराता है इक इसी नाम ने बर्बाद किया था उस को आज बस इस लिए ही याद किया था उस को नींद फिर कैसे लगे जाए भी क्यूँ सोने वो याद जो कर लिया तो लग गया है रोने वो रात भर रोएगा अब सुर्ख़ पड़े नैन से वो माँ तो समझेगी कि सोया है बड़े चैन से वो माँ की ख़ातिर ही तो मुॅंह छुप गया था चादर से जाने पर किस लिए अब उठ गया है बिस्तर से या'नी अब ऐसा कोई काम करेगा लड़का अपने घर वालों को बदनाम करेगा लड़का काम जो करना है उस काम से घबराया है शाम को इस लिए मय-ख़ाने से हो आया है ज़िक्र कर आया था इस काम का मय-ख़ाने में कोई शय खोज रहा इस लिए तह-ख़ाने में किसी आवाज़ बिना होगा तमाशा ऐसा शोर करता नहीं हथियार तलाशा ऐसा ख़ुश तो है हाथ में रस्सी लिए मन अब उस का काँपने लग गया है पर ये बदन अब उस का मुस्कुरा कर मगर कहता है कि सुन बात मिरी अलविदा हँस के ही कर आख़िरी है रात मिरी या'नी अब ज़िंदगी का आख़िरी दम आ गया है आगे बस मौत ही है ऐसा क़दम आ गया है कँपकँपाते लबों से नाम वही जाप रहा आँखें छत देख रही हाथ गला नाप रहा नाम अब उस के गले में ही अटक जाएगा देखते देखते वो छत से लटक जाएगा क्यूँ भला इतना है अफ़सुर्दा वो भी मेरी तरह होना क्यूँ चाहता है मुर्दा वो भी मेरी तरह मुझ सा क्यूँ दिख रहा है मुझ को हर इक मायने में मुझ को ये शख़्स ही क्यूँ दिख रहा है आइने में
Bhuwan Singh
1 likes
चाय लम्हा लम्हा सोते जागते सवार रहता है ज़ेहन-ओ-दिल में रोज़-ओ-शब बस इक ख़ुमार रहता है हर हवस से इश्क़ से जुनून से ज़ियादा है कुछ मेरी रगों में मेरे ख़ून से ज़ियादा है इस क़दर मैं मुंतज़िर हूँ उस की एक दीद का गोया रोज़ करता हूँ मैं इंतिज़ार ईद का दर्द-ओ-ग़म को उस सेे कोई एतिराज़ भी नहीं दुनिया में तो उस के जैसा चारासाज़ भी नहीं साथ उसी का है बदलते मौसमों की फ़िक्र में नाम उसी का लेता हूँ मेरे सुकूँ के ज़िक्र में ज़िंदा रह तो सकता हूँ मैं आब-ओ-दाना छोड़कर जी नहीं सकूँगा पर मैं उस सेे रिश्ता तोड़कर उस का रूप सीना चीर के दिखा भी सकता हूँ कोसों दूर चाय के लिए मैं जा भी सकता हूँ
Bhuwan Singh
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Bhuwan Singh.
Similar Moods
More moods that pair well with Bhuwan Singh's nazm.







