"तुम ख़ुशी हो मेरी" मैं बोला तेरे लब पर हैं हँसी मेरी वो बोली मत बढ़ाओ बेचैनी मेरी मैं बोला शहज़ादी मोल क्या मेरा वो बोली शहज़ादा ज़िन्दगी मेरी मैं बोला तीरगी हर-सू ज़्यादा हैं वो बोली फैलाने दो रौशनी मेरी मैं बोला हिज़्र में कैसे जियोगे तुम वो बोली रुक जाएगी साँस मेरी मैं बोला ख़्वाब किस के देखते हो वो बोली आँख देखो क़भी मेरी मैं बोला क्यूँँ बेचैन रहतें तो तुम वो बोली कहर है दिल की लगी मेरी. मैं बोला तुम सुखन ही शहज़ादी हो वो बोली तुम शा'इरी हो मेरी मैं बोला ज़िन्दगी पर ग़म के साए हैं वो बोली तुम हर ख़ुशी हो मेरी
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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो
ZafarAli Memon
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"इतनी सी इजाज़त" तेरे दर्द को अपना बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ज़ख़्मो पर मरहम लगा दूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ख़्वाबों को आँखों में सज़ा लूँ तेरे यादों को दिल में बसा लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरी रातों को अपनी रात बना लूँ तुझे आख़री मुलाक़ात बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे आँखों का काज़ल बना लूँ तुझे घुँघरू वाली पायल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे धड़कन की तार बना लूँ तुझे ज़िन्दगी का सार बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे सफ़र का मंज़िल बना लूँ तुझे कंधे का तिल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे होंठो का मुस्कान बना लूँ तुझे अपनी पहचान बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बना लूँ तुझे अपनी किताब का क़िस्सा बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो
Muskan Singh
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"औरत की ज़िंदगी" कभी कभी दिल की बात भी बता नहीं पाते सबकी सुनने में अपनी ही सुना नहीं पाते सजाकर रखते हैं जिस घर की दीवारों को उस घर में ही खुलकर मुस्कुरा नहीं पाते अजीब ज़िंदगी है औरत की भी माँ बाप के घर में अपनी जगह बना नहीं पाते जिस घर को चुना है तकदीर ने हमारे लिए उस घर में जा कर घूँघट उठा नहीं पाते अब कौन देखता है चेहरे पे ग़म है या ख़ुशी सबके सामने आँसू भी अब बहा नहीं पाते
Muskan Singh
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"ऑनलाइन की दुनिया" अजनबी तो हम भी थे लेकिन जमाने के लिए उसे सिर्फ़ अपना समझा, अपना बनाने के लिए! बात बात में रूठ कर ख़फ़ा हो जाता था व मुझ सेे मैं ने बहुत कोशिश की रूठे यार को मनाने के लिए और यहाँ समझता कोई नहीं सच्ची मोहब्बत को दिल खोलकर रख दिया,उसे हाल-ए-दिल सुनाने के लिए! फिर भी नहीं समझ पाया वो मेरे दिल में ज़ज़्बात को, मैं ने भी अब उसे छोड़ दिया, ज़माने की ठोकर खाने के लिए! मोहब्बत में थोड़ा सा झुकना,थोड़ा टूटना ज़रूरी है, लेकिन हर बार नहीं गिर सकती, सिर्फ़ एक को उठाने के लिए! बहुत मिलेंगे राह में मुसाफ़िर, सफ़र अभी तो शुरू हुआ बहुत आएँगे बहुत जाएँगे मुझे भी आज़माने के लिए! कभी भी गिर कर प्यार मत करना किसी से ऐ दोस्तो यहाँ लोग भरोसा भी तोड़ते है, सिर्फ़ हवस मिटाने के लिए! अगर मोहब्बत सच्ची हो तो, दूर तक पाकीज़गी नज़र आएगी वरना फ़रेब इश्क़ करते है लोग सिर्फ़ वक़्त निकालने के लिए! गर फस जाओ कभी ऐसे जंजाल में तो फिर क़दम पीछे कर लेना आप की ज़िंदगी बचाने के लिए! बहुत मिलते है मेहब्बत करने वाले लोग यहाँ ऑनलाइन की दुनिया में कभी इन की बातों में मत आना, बा'द में पछताने के लिए!
Muskan Singh
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