"इतनी सी इजाज़त" तेरे दर्द को अपना बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ज़ख़्मो पर मरहम लगा दूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरे ख़्वाबों को आँखों में सज़ा लूँ तेरे यादों को दिल में बसा लूँ इतनी सी इजाज़त दो तेरी रातों को अपनी रात बना लूँ तुझे आख़री मुलाक़ात बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे आँखों का काज़ल बना लूँ तुझे घुँघरू वाली पायल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे धड़कन की तार बना लूँ तुझे ज़िन्दगी का सार बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे सफ़र का मंज़िल बना लूँ तुझे कंधे का तिल बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे होंठो का मुस्कान बना लूँ तुझे अपनी पहचान बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो तुझे अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बना लूँ तुझे अपनी किताब का क़िस्सा बना लूँ इतनी सी इजाज़त दो
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"औरत की ज़िंदगी" कभी कभी दिल की बात भी बता नहीं पाते सबकी सुनने में अपनी ही सुना नहीं पाते सजाकर रखते हैं जिस घर की दीवारों को उस घर में ही खुलकर मुस्कुरा नहीं पाते अजीब ज़िंदगी है औरत की भी माँ बाप के घर में अपनी जगह बना नहीं पाते जिस घर को चुना है तकदीर ने हमारे लिए उस घर में जा कर घूँघट उठा नहीं पाते अब कौन देखता है चेहरे पे ग़म है या ख़ुशी सबके सामने आँसू भी अब बहा नहीं पाते
Muskan Singh
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"ऑनलाइन की दुनिया" अजनबी तो हम भी थे लेकिन जमाने के लिए उसे सिर्फ़ अपना समझा, अपना बनाने के लिए! बात बात में रूठ कर ख़फ़ा हो जाता था व मुझ सेे मैं ने बहुत कोशिश की रूठे यार को मनाने के लिए और यहाँ समझता कोई नहीं सच्ची मोहब्बत को दिल खोलकर रख दिया,उसे हाल-ए-दिल सुनाने के लिए! फिर भी नहीं समझ पाया वो मेरे दिल में ज़ज़्बात को, मैं ने भी अब उसे छोड़ दिया, ज़माने की ठोकर खाने के लिए! मोहब्बत में थोड़ा सा झुकना,थोड़ा टूटना ज़रूरी है, लेकिन हर बार नहीं गिर सकती, सिर्फ़ एक को उठाने के लिए! बहुत मिलेंगे राह में मुसाफ़िर, सफ़र अभी तो शुरू हुआ बहुत आएँगे बहुत जाएँगे मुझे भी आज़माने के लिए! कभी भी गिर कर प्यार मत करना किसी से ऐ दोस्तो यहाँ लोग भरोसा भी तोड़ते है, सिर्फ़ हवस मिटाने के लिए! अगर मोहब्बत सच्ची हो तो, दूर तक पाकीज़गी नज़र आएगी वरना फ़रेब इश्क़ करते है लोग सिर्फ़ वक़्त निकालने के लिए! गर फस जाओ कभी ऐसे जंजाल में तो फिर क़दम पीछे कर लेना आप की ज़िंदगी बचाने के लिए! बहुत मिलते है मेहब्बत करने वाले लोग यहाँ ऑनलाइन की दुनिया में कभी इन की बातों में मत आना, बा'द में पछताने के लिए!
Muskan Singh
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"तुम ख़ुशी हो मेरी" मैं बोला तेरे लब पर हैं हँसी मेरी वो बोली मत बढ़ाओ बेचैनी मेरी मैं बोला शहज़ादी मोल क्या मेरा वो बोली शहज़ादा ज़िन्दगी मेरी मैं बोला तीरगी हर-सू ज़्यादा हैं वो बोली फैलाने दो रौशनी मेरी मैं बोला हिज़्र में कैसे जियोगे तुम वो बोली रुक जाएगी साँस मेरी मैं बोला ख़्वाब किस के देखते हो वो बोली आँख देखो क़भी मेरी मैं बोला क्यूँँ बेचैन रहतें तो तुम वो बोली कहर है दिल की लगी मेरी. मैं बोला तुम सुखन ही शहज़ादी हो वो बोली तुम शा'इरी हो मेरी मैं बोला ज़िन्दगी पर ग़म के साए हैं वो बोली तुम हर ख़ुशी हो मेरी
Muskan Singh
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