"वफ़ा किस सेे बता तू ने निभाई" तेरी आँखों का पानी मर गया है तभी ग़ायब तेरी शर्म-ओ-हया है ख़फ़ा थी हम सेे तू हम ने ये माना तभी तू ने नया ढूँढा ठिकाना बढ़ाई ग़ैर से भी आशनाई मगर उस सेे भी की है बे-वफ़ाई तुझे देवी के जैसे पूजते थे तेरी आँखों से दुनिया देखते थे मगर जाने तुझे क्या हो गया उफ़ मोहब्बत में हमें धोखा दिया उफ़ इमारत प्यार की तू ने बनाई बता क्यूँ अपने ही हाथों से ढाई न जाने क्या सभी से चाहती है तभी तू दिल को ऐसे तोड़ती है करेंगे ख़ुद-कुशी ये सोचती है यही जा कर सभी से बोलती है सभी से की है तू ने बे-वफ़ाई वफ़ा किस से बता तू ने निभाई किया जो काम था वो सोच लेती तू अपने नाम को ही देख लेती वफ़ा ता-उम्र हम तुझ सेे निभाते तेरी हम माँग मोती से सजाते न तू हम को मगर पहचान पाई हमारे साथ की बस बे-वफ़ाई
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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“लखनऊ” अमाँ ये लखनवी लहजा हमारा यही तहज़ीब का चर्चा हमारा यहाँ हम तुम नहीं कहते किसी से यहाँ है आप से रिश्ता हमारा यही तहज़ीब का मरकज़ रहा है नज़ाकत औ नफ़ासत से भरा है यही तो शहर है इल्म-ओ-अदब का चिकनकारी का भी डंका बजा है अमीनाबाद का बाज़ार भी है हुसैनाबाद मेरे यार भी है ये हज़रतगंज तो है रूह इस की ये उर्दू का तो ख़िदमत-गार भी है ज़बाँ में जैसे मिश्री घोलती है यहाँ सर चढ़ के उर्दू बोलती है कि उस का लखनऊ से राब्ता है हमारे दिल को जा कर खोलती है असर असरार जैसे शाइरों ने अदब औ शा'इरी के आशिकों ने सजाया है इसे इल्म-ओ-अदब से निराला और नागर लेखकों ने
Prashant Arahat
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"दुल्हन" मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मेरी बातों पे थोड़ा ध्यान दीजो मैं तुम को क्या बताना चाहता हूँ तुम्हीं से दिलकशी है उंस भी है मुहब्बत को बढ़ाना चाहता हूँ अक़ीदत को इबादत ही समझकर जुनूँ के पार जाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ सभी बातों को मेरी सच न मानो मैं थोड़ा सच छुपाना चाहता हूँ यहाँ मैं रह नहीं सकता अकेले तभी मैं भी ठिकाना चाहता हूँ लगेगी किस तरह जोड़ी हमारी मैं तुम सेे राय लेना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ तेरे क़दमों में ही ख़ुशियाँ बिछाकर मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूँ जो मर्ज़ी हो तुम्हारी तो सही है तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ तुम्हारे दिल तुम्हारे शहर में ही ओ जानेमन ठिकाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ
Prashant Arahat
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यतीम आँखें हमारी आँखें न जाने कब से ये मुंतज़िर हैं इसी तरह से अभी तलक है इन्हें भरोसा कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं मगर करूँँ क्या यतीम आँखें ये बेसहारा कोई भी इनका यहाँ नहीं है है इन की ख़्वाहिश वो एक चेहरा जो सब सेे प्यारा जो मन को भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए। मगर करूँँ क्या वो एक चेहरा कहाँ से लाऊँ ये बात अपनी जगह सही है कि कोई आँखें यतीम कैसे मगर बताऊँ तुम्हें हक़ीक़त ये कहने को हैं हमारी आँखें हमारा क्या है हमारा इन में तो कुछ नहीं है मैं ख़ुद अभी तक था यक ज़रीया जो इनको सब कुछ दिखा रहा था मगर करूँँ क्या ये बेबसी है कोई भी चेहरा कोई भी मंज़र कहीं नहीं है जो इनको भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए ये बात अपनी जगह सही है हमारी दुनिया बहुत से चेहरों का एक जंगल मगर ये आँखें हमारी आँखें यतीम आँखें इन्हें अँधेरा ही दिख रहा है न कोई मंज़र न कोई चेहरा न कोई जंगल न कोई सहरा हमारी आँखें ये आस में हैं ये उन की ही बस तलाश में हैं कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं अभी तलक वो हमीं से रिश्ता निभा रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं
Prashant Arahat
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"मेरा महबूब शाइ'र है" सुना है वो सहेली को मेरी ग़ज़लें पढ़ाती है ख़ुशी से ये बताती है मेरा महबूब शाइ'र है पिरो कर लफ़्ज़ मोती से ग़ज़ल तैयार करता है वो लड़का आज भी शिद्दत से मुझ को प्यार करता है मेरी हर बात को वो नज़्म का हिस्सा बनाता है कहीं रुख़सार मेरे या कहीं चश्मा बनाता है कभी वो पूछता है क्या तेरे गालों में डिंपल है वो शाइ'र है बहुत अच्छा मगर थोड़ा सा पागल है सुना है इब्तिदा-ए-इश्क़ से ले कर अभी तक की अधूरे प्यार की पूरी कहानी लिख रहा है वो अजब है कैफ़ियत उस की अजब अंदाज़ हैं उस के वो मिलता है तो बातों में ही दिन से रात करता है कहा उस ने सहेली से कि उस की नौकरी हो तो ये मुमकिन है कि घर वाले भी हों तैयार शादी को ये फ़नकारी पे हावी हो गई है नौकरी जब से मैं घर में कह नहीं सकती मेरा महबूब शाइ'र है सुना है वो दु'आओं में हमेशा ये ही कहती है ख़ुदावंद ऐ, मैं तेरी रहमतों पर नाज़ करती हूँ मेरे आशिक़ मेरे शाइ'र पे इतनी मेहरबानी कर उसे तू एक अच्छी सी अता अब नौकरी कर दे
Prashant Arahat
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