यतीम आँखें हमारी आँखें न जाने कब से ये मुंतज़िर हैं इसी तरह से अभी तलक है इन्हें भरोसा कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं मगर करूँँ क्या यतीम आँखें ये बेसहारा कोई भी इनका यहाँ नहीं है है इन की ख़्वाहिश वो एक चेहरा जो सब सेे प्यारा जो मन को भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए। मगर करूँँ क्या वो एक चेहरा कहाँ से लाऊँ ये बात अपनी जगह सही है कि कोई आँखें यतीम कैसे मगर बताऊँ तुम्हें हक़ीक़त ये कहने को हैं हमारी आँखें हमारा क्या है हमारा इन में तो कुछ नहीं है मैं ख़ुद अभी तक था यक ज़रीया जो इनको सब कुछ दिखा रहा था मगर करूँँ क्या ये बेबसी है कोई भी चेहरा कोई भी मंज़र कहीं नहीं है जो इनको भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए ये बात अपनी जगह सही है हमारी दुनिया बहुत से चेहरों का एक जंगल मगर ये आँखें हमारी आँखें यतीम आँखें इन्हें अँधेरा ही दिख रहा है न कोई मंज़र न कोई चेहरा न कोई जंगल न कोई सहरा हमारी आँखें ये आस में हैं ये उन की ही बस तलाश में हैं कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं अभी तलक वो हमीं से रिश्ता निभा रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"वफ़ा किस सेे बता तू ने निभाई" तेरी आँखों का पानी मर गया है तभी ग़ायब तेरी शर्म-ओ-हया है ख़फ़ा थी हम सेे तू हम ने ये माना तभी तू ने नया ढूँढा ठिकाना बढ़ाई ग़ैर से भी आशनाई मगर उस सेे भी की है बे-वफ़ाई तुझे देवी के जैसे पूजते थे तेरी आँखों से दुनिया देखते थे मगर जाने तुझे क्या हो गया उफ़ मोहब्बत में हमें धोखा दिया उफ़ इमारत प्यार की तू ने बनाई बता क्यूँ अपने ही हाथों से ढाई न जाने क्या सभी से चाहती है तभी तू दिल को ऐसे तोड़ती है करेंगे ख़ुद-कुशी ये सोचती है यही जा कर सभी से बोलती है सभी से की है तू ने बे-वफ़ाई वफ़ा किस से बता तू ने निभाई किया जो काम था वो सोच लेती तू अपने नाम को ही देख लेती वफ़ा ता-उम्र हम तुझ सेे निभाते तेरी हम माँग मोती से सजाते न तू हम को मगर पहचान पाई हमारे साथ की बस बे-वफ़ाई
Prashant Arahat
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“लखनऊ” अमाँ ये लखनवी लहजा हमारा यही तहज़ीब का चर्चा हमारा यहाँ हम तुम नहीं कहते किसी से यहाँ है आप से रिश्ता हमारा यही तहज़ीब का मरकज़ रहा है नज़ाकत औ नफ़ासत से भरा है यही तो शहर है इल्म-ओ-अदब का चिकनकारी का भी डंका बजा है अमीनाबाद का बाज़ार भी है हुसैनाबाद मेरे यार भी है ये हज़रतगंज तो है रूह इस की ये उर्दू का तो ख़िदमत-गार भी है ज़बाँ में जैसे मिश्री घोलती है यहाँ सर चढ़ के उर्दू बोलती है कि उस का लखनऊ से राब्ता है हमारे दिल को जा कर खोलती है असर असरार जैसे शाइरों ने अदब औ शा'इरी के आशिकों ने सजाया है इसे इल्म-ओ-अदब से निराला और नागर लेखकों ने
Prashant Arahat
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"दुल्हन" मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मेरी बातों पे थोड़ा ध्यान दीजो मैं तुम को क्या बताना चाहता हूँ तुम्हीं से दिलकशी है उंस भी है मुहब्बत को बढ़ाना चाहता हूँ अक़ीदत को इबादत ही समझकर जुनूँ के पार जाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ सभी बातों को मेरी सच न मानो मैं थोड़ा सच छुपाना चाहता हूँ यहाँ मैं रह नहीं सकता अकेले तभी मैं भी ठिकाना चाहता हूँ लगेगी किस तरह जोड़ी हमारी मैं तुम सेे राय लेना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ तेरे क़दमों में ही ख़ुशियाँ बिछाकर मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूँ जो मर्ज़ी हो तुम्हारी तो सही है तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ तुम्हारे दिल तुम्हारे शहर में ही ओ जानेमन ठिकाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ
Prashant Arahat
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"मेरा महबूब शाइ'र है" सुना है वो सहेली को मेरी ग़ज़लें पढ़ाती है ख़ुशी से ये बताती है मेरा महबूब शाइ'र है पिरो कर लफ़्ज़ मोती से ग़ज़ल तैयार करता है वो लड़का आज भी शिद्दत से मुझ को प्यार करता है मेरी हर बात को वो नज़्म का हिस्सा बनाता है कहीं रुख़सार मेरे या कहीं चश्मा बनाता है कभी वो पूछता है क्या तेरे गालों में डिंपल है वो शाइ'र है बहुत अच्छा मगर थोड़ा सा पागल है सुना है इब्तिदा-ए-इश्क़ से ले कर अभी तक की अधूरे प्यार की पूरी कहानी लिख रहा है वो अजब है कैफ़ियत उस की अजब अंदाज़ हैं उस के वो मिलता है तो बातों में ही दिन से रात करता है कहा उस ने सहेली से कि उस की नौकरी हो तो ये मुमकिन है कि घर वाले भी हों तैयार शादी को ये फ़नकारी पे हावी हो गई है नौकरी जब से मैं घर में कह नहीं सकती मेरा महबूब शाइ'र है सुना है वो दु'आओं में हमेशा ये ही कहती है ख़ुदावंद ऐ, मैं तेरी रहमतों पर नाज़ करती हूँ मेरे आशिक़ मेरे शाइ'र पे इतनी मेहरबानी कर उसे तू एक अच्छी सी अता अब नौकरी कर दे
Prashant Arahat
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