“लखनऊ” अमाँ ये लखनवी लहजा हमारा यही तहज़ीब का चर्चा हमारा यहाँ हम तुम नहीं कहते किसी से यहाँ है आप से रिश्ता हमारा यही तहज़ीब का मरकज़ रहा है नज़ाकत औ नफ़ासत से भरा है यही तो शहर है इल्म-ओ-अदब का चिकनकारी का भी डंका बजा है अमीनाबाद का बाज़ार भी है हुसैनाबाद मेरे यार भी है ये हज़रतगंज तो है रूह इस की ये उर्दू का तो ख़िदमत-गार भी है ज़बाँ में जैसे मिश्री घोलती है यहाँ सर चढ़ के उर्दू बोलती है कि उस का लखनऊ से राब्ता है हमारे दिल को जा कर खोलती है असर असरार जैसे शाइरों ने अदब औ शा'इरी के आशिकों ने सजाया है इसे इल्म-ओ-अदब से निराला और नागर लेखकों ने
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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नज़्म:-'शाहज़ादी' बहुत नादान थी लड़की मुझे अपना समझती थी मुझी पे जाँ लुटाती थी बहुत बातें बनाती थी मुझे क़िस्से सुनाती थी और उस में शाहज़ादी थी जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.! वो कहती थी, कि मैं भी शाहज़ादी हूँ मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! जो मुझ पे जाँ लुटाएगा मुझे अपना बनाएगा.. मैं कहता था, कि मैं हूँ आम सा लड़का मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.! तुम्हें देखूं तो लगता है, मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी.. मैं तुम सेे बात करता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी.. तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है, मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे.. सो यूँ समझो, मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम. मोहब्बत का हो मतलब तुम. वो कहती थी, चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो कहा मैं ने, अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ कहीं से ढूंढ़ के लाओ है कोई शाहज़ादा तो कि तुम तो शाहज़ादी हो तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.! दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी. दिखाया तो नहीं लेकिन वो ख़ुद में खो गई शायद या कोई मिल गया उस को वो अब बातें बनाना भूल जाती थी मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी फिर इक दिन फोन कर बोली कहा था ना, कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.! तो देखो ढूंढ़ लाई मैं तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है मुझे अपना बताता है बहुत पैसे कमाता है वो कहता है उसे मुझ सेे मोहब्बत है जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे कि तुम हो आम से लड़के, सो तुम सेे दूर जाना है उसे अपना बनाना है मुझे घर भी बसाना है.. मैं उस को अलविदा कहता दुआ भी दे ही देता ना.! बहुत जल्दी में थी शायद सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा, बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!! बहुत नादान थी लड़की__....
Ankit Maurya
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मर्द-ए-मोहब्बत उस की डिक्शनरी में मर्द का मतलब "ना-मर्द" लिखा हुआ है ख़ुश-क़िस्मत मर्द और औरतें एक दूसरे के दिल की पसंद होते हैं उस की बद-क़िस्मती की पोशाक पर सब से बड़ा दाग़ यही है के वो कुछ ना-मर्दों के निचले हिस्से को पसंद है! सिवाए एक मर्द के सिवाए एक शख़्स के उसे किसी मर्द के दिल ने नहीं चाहा जिस ने उसे उस लम्हें भी सिर्फ़ देखा जो लम्हा मर्द और ना-मर्द होने का फ़ैसला कर दिया करता है मर्द अपनी मोहब्बत के लिए बे-शुमार नज़्में लिख सकता है मगर एक बार भी अपनी मोहब्बत को गाली नहीं दे सकता भले उस की महबूबा जिस्म-फ़रोश ही क्यूँ ना हो मर्द के लिए देवी होती है अज़ीम लड़कियों और इज़्ज़त मंद मर्दों के दिल सलामत रहें जो धोके की तलवारों से काट दिए गए मगर अपनी मोहब्बत की बे-हुर्मती पर तैयार न हुआ एक मर्द का लहू-लुहान दिल जिसे बद-दुआ की पूरी इजाज़त है वो फिर भी दुआ में यही कहता है मौला उसे उस के नाम का साया नसीब कर वो समझ सके कि मोहब्बत और मर्द की "मीम" एक ही मिट्टी से बनी है मोहब्बत और मर्द के सात हुरूफ़ मिल कर "साथ" बनाते हैं लेकिन उसे ये रम्ज़ कोई मर्द ही बता सकता है उस की डिक्शनरी और ज़िन्दगी में कोई मर्द नहीं है
Ali Zaryoun
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"हमारा गाँव" सुनो अपने मैं तेलिया गाँव का क़िस्सा सुनाता हूँ तुम्हें लफ्ज़ों में अपने आज बहराइच दिखाता हूँ जहाँ पर सड़कें कच्ची हैं, जहाँ हर सम्त ग़ुरबत है जहाँ पर आज भी लोगों को शिक्षा की ज़रूरत है जहाँ के लोग पैसों के लिए परदेस जाते हैं वो खा के रूखी सूखी रोटीयाँ पैसे कमाते हैं मगर फिर भी हमारे गाँव के लोगों में उल्फ़त है हमें इस गाँव से हर हाल में बेशक मुहब्बत है मुझे वो खेत, वो बगिया, सभी अब याद आते हैं मैं हूँ लखनऊ में लेकिन मुझे वो सब बुलाते हैं हमारे गाँव से कुछ दूरी पर सरजू निकलती है नहाओ जब भी उस पानी में तो ख़ुशबू निकलती है बताएँ किस क़दर हम धूप में न छाँव में बैठे गए जब भी हम अपने मदरसे तो नाँव में बैठे वो बहता सरजू का पानी हमारा नाँव में होना नज़ारा कितना दिलकश था हमारा गाँव में होना
Hameed Sarwar Bahraichi
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"वफ़ा किस सेे बता तू ने निभाई" तेरी आँखों का पानी मर गया है तभी ग़ायब तेरी शर्म-ओ-हया है ख़फ़ा थी हम सेे तू हम ने ये माना तभी तू ने नया ढूँढा ठिकाना बढ़ाई ग़ैर से भी आशनाई मगर उस सेे भी की है बे-वफ़ाई तुझे देवी के जैसे पूजते थे तेरी आँखों से दुनिया देखते थे मगर जाने तुझे क्या हो गया उफ़ मोहब्बत में हमें धोखा दिया उफ़ इमारत प्यार की तू ने बनाई बता क्यूँ अपने ही हाथों से ढाई न जाने क्या सभी से चाहती है तभी तू दिल को ऐसे तोड़ती है करेंगे ख़ुद-कुशी ये सोचती है यही जा कर सभी से बोलती है सभी से की है तू ने बे-वफ़ाई वफ़ा किस से बता तू ने निभाई किया जो काम था वो सोच लेती तू अपने नाम को ही देख लेती वफ़ा ता-उम्र हम तुझ सेे निभाते तेरी हम माँग मोती से सजाते न तू हम को मगर पहचान पाई हमारे साथ की बस बे-वफ़ाई
Prashant Arahat
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"दुल्हन" मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मेरी बातों पे थोड़ा ध्यान दीजो मैं तुम को क्या बताना चाहता हूँ तुम्हीं से दिलकशी है उंस भी है मुहब्बत को बढ़ाना चाहता हूँ अक़ीदत को इबादत ही समझकर जुनूँ के पार जाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ सभी बातों को मेरी सच न मानो मैं थोड़ा सच छुपाना चाहता हूँ यहाँ मैं रह नहीं सकता अकेले तभी मैं भी ठिकाना चाहता हूँ लगेगी किस तरह जोड़ी हमारी मैं तुम सेे राय लेना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ तेरे क़दमों में ही ख़ुशियाँ बिछाकर मैं दुनिया को दिखाना चाहता हूँ जो मर्ज़ी हो तुम्हारी तो सही है तुम्हें अपना बनाना चाहता हूँ तुम्हारे दिल तुम्हारे शहर में ही ओ जानेमन ठिकाना चाहता हूँ तुम्हें दुल्हन बनाना चाहता हूँ मैं तुम को ये बताना चाहता हूँ
Prashant Arahat
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यतीम आँखें हमारी आँखें न जाने कब से ये मुंतज़िर हैं इसी तरह से अभी तलक है इन्हें भरोसा कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं मगर करूँँ क्या यतीम आँखें ये बेसहारा कोई भी इनका यहाँ नहीं है है इन की ख़्वाहिश वो एक चेहरा जो सब सेे प्यारा जो मन को भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए। मगर करूँँ क्या वो एक चेहरा कहाँ से लाऊँ ये बात अपनी जगह सही है कि कोई आँखें यतीम कैसे मगर बताऊँ तुम्हें हक़ीक़त ये कहने को हैं हमारी आँखें हमारा क्या है हमारा इन में तो कुछ नहीं है मैं ख़ुद अभी तक था यक ज़रीया जो इनको सब कुछ दिखा रहा था मगर करूँँ क्या ये बेबसी है कोई भी चेहरा कोई भी मंज़र कहीं नहीं है जो इनको भाए जो दिल को दिल के क़रीब लाए ये बात अपनी जगह सही है हमारी दुनिया बहुत से चेहरों का एक जंगल मगर ये आँखें हमारी आँखें यतीम आँखें इन्हें अँधेरा ही दिख रहा है न कोई मंज़र न कोई चेहरा न कोई जंगल न कोई सहरा हमारी आँखें ये आस में हैं ये उन की ही बस तलाश में हैं कि जो गए थे पलट के वापस वो आ रहे हैं अभी तलक वो हमीं से रिश्ता निभा रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं वो आ रहे हैं
Prashant Arahat
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"मेरा महबूब शाइ'र है" सुना है वो सहेली को मेरी ग़ज़लें पढ़ाती है ख़ुशी से ये बताती है मेरा महबूब शाइ'र है पिरो कर लफ़्ज़ मोती से ग़ज़ल तैयार करता है वो लड़का आज भी शिद्दत से मुझ को प्यार करता है मेरी हर बात को वो नज़्म का हिस्सा बनाता है कहीं रुख़सार मेरे या कहीं चश्मा बनाता है कभी वो पूछता है क्या तेरे गालों में डिंपल है वो शाइ'र है बहुत अच्छा मगर थोड़ा सा पागल है सुना है इब्तिदा-ए-इश्क़ से ले कर अभी तक की अधूरे प्यार की पूरी कहानी लिख रहा है वो अजब है कैफ़ियत उस की अजब अंदाज़ हैं उस के वो मिलता है तो बातों में ही दिन से रात करता है कहा उस ने सहेली से कि उस की नौकरी हो तो ये मुमकिन है कि घर वाले भी हों तैयार शादी को ये फ़नकारी पे हावी हो गई है नौकरी जब से मैं घर में कह नहीं सकती मेरा महबूब शाइ'र है सुना है वो दु'आओं में हमेशा ये ही कहती है ख़ुदावंद ऐ, मैं तेरी रहमतों पर नाज़ करती हूँ मेरे आशिक़ मेरे शाइ'र पे इतनी मेहरबानी कर उसे तू एक अच्छी सी अता अब नौकरी कर दे
Prashant Arahat
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