nazmKuch Alfaaz

न जाने कितनी सदियों से ज़माना मिसाल-ए-मौज बहता आ रहा है सुकूँ का रंग उस को कब मिला है परेशाँ है ये क्यूँँ किस को पता है ये बे-ताबी हर इक लम्हे की क्या है कभी ऐसा भी होता है कि दरिया लिए तूफ़ाँ हज़ारों अपने अंदर सुकूँ से पर नज़र आता है बाहर कभी ऐसा भी होता है ज़माना कशाकश से भरा होता है लेकिन नज़र आता है इक नुक़्ते पे साकिन ज़माना कब मगर साकिन रहा है कि चलता ही रहा है ये ज़माना दमा-दम पय-ब-पय लम्हा-ब-लम्हा कभी ऐसा भी होता है कि राही नज़र आता है कुछ रुकता हुआ सा हिरासाँ मुज़्महिल थकता हुआ सा मगर राही सफ़र में कब रुका है कि राही ज़िंदगी का गर रुकेगा यक़ीनन अपनी मंज़िल पर रुकेगा मगर ये ज़िंदगी तो बे-कराँ है निगाह-ए-शौक़ की मंज़िल कहाँ है कि हर मंज़िल फ़क़त वहम-ओ-गुमाँ है ये हस्ती जेहद-ए-ग़म की दास्ताँ है ब-ज़ाहिर है सुबुक रफ़्तार-ओ-कमज़ोर ग़नीम-ए-शौक़ हो मद्द-ए-मुक़ाबिल तो उस का हर-नफ़स आतिश-फ़िशाँ है है यूँँ तो ज़िंदगी कितनी सुबुक-रौ अजब इक एक लम्हे की तग-ओ-दौ ये इक लम्हा गुज़रता ही नहीं है मगर जब इस नज़र के सामने से गुज़रती है ख़िरद बिजली की सूरत दिखा कर इक अनोखा सा करिश्मा तो यूँँ महसूस होता है कि जैसे ज़माना कितना आगे जा चुका है ज़माना और भी आगे बढ़ेगा लिए बाहम सुबुक-रफ़्तार लम्हे गुज़रता जाएगा सदियों को रौंदे ख़िरद की रहनुमाई के सहारे

Daud Ghazi0 Likes

Related Nazm

"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ

Ammar Iqbal

13 likes

हम दोनो घर चल देंगे हाथ पकड़ कर रख मेरा सर सीने पर रख मेरा यक़ीन तू कर, तू कहीं जाने वाला नहीं है वेंटिलेटर कम पड़ जाए तो क्या ? अपने हाथों को वेंटिलेटर, मैं बना दूँगा मैं तेरी सांसो की ख़ातिर सच में सनम मैं अपनी सांसे तक गिरवी रख दूँगा मैं रब से झगड़ा कर लूंगा पर कैसे भी मैं तुझ को जाने नहीं दूँगा तू घबरा मत सब कुछ ठीक हो जाएगा जैसे पहले था सब वैसा हो जाएगा तू रो मत इतनी सी तो बात है, और इतना कुछ तो हम ने साथ में झेला है और फिर इक दिन ये भी दुख चला जाएगा ऐसा समझो हम एक जंग में है ऐसा जानो हम जीतेंगे बस तू अपना हौसला मत जाने देना बाकी तो तू मुझ पर छोड़ दे सब कुछ मैं हूँ ना !! क्यूँ फिक्र तू करती है ? जैसे कट जाता है हर इक दिन वैसे ये दिन भी कट जाएगा ये अँधेरा धीरे-धीरे हट जाएगा फिर से सहर होगी हमनें कितना कुछ जीना है अभी तो अपना वेट भी करता होगा, घर अपना तेरी बातों में फिर से खोना है मुझे तेरे साथ अभी कितना हँसना है मुझे मैं ने तेरे हाथों का खाना फिर से खाना है तू टेंशन मत रख हम जल्दी ही घर चल देंगे तुझ को कुछ नहीं होगा बस कुछ दिन की बात है फिर हम दोनो घर चल देंगे

BR SUDHAKAR

10 likes

"चार ज़िंदगी" सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र माँ का पेट और दुनिया का घर छोटी सी क़ब्र और मैदान-ए-हश्र पहली ज़िंदगी का तसव्वुर अगर माँ का पेट तुम को आएगा नज़र नौ महीने जिस ने किया था सब्र तुम ने दिया क्या उस का अज्र दूसरी ज़िंदगी दुनिया का घर जिस में बसाया तुम ने शहर थी चार दिन की ज़िंदगी मगर उस पर लगा दी पूरी उम्र मिली जब मौत की सब को ख़बर पछताने लगे फिर हुआ ये असर अहल-ओ-अयाल भी रोए इधर हुआ तैयार जनाज़ा उधर तीसरी ज़िंदगी जिस का पेट क़ब्र होंगे सब दूर तुझे दफ़न कर आएँगे फ़रिश्ते फ़ौरन क़ब्र पर लगेगा सवालों का एक अंबर देना जवाब तब ख़ुद के बल पर जब पहुँचेगी दुनिया उस मोड़ पर क़यामत तक है क़ब्र का सफ़र चौथी ज़िंदगी मैदान-ए-हश्र जिधर मिलेगा नेकी-बदी का अज्र सामने होगा पुल-सिरात सफ़र तेज़ी से गुज़रेगा वो ही उसपर जो पढ़ता नमाज़ मग़रिब से अस्र जिस ने किया बैतुल्लाह का सफ़र जिस ने बनाया नबी को रहबर जन्नत में होंगे महल और शजर और दोज़ख़ में होंगे आग के अंबर न मालूम कितनी है बाक़ी उम्र आएगी मौत कभी भी ‘ज़फ़र' जितनी है बाक़ी लगा दीं पर सब को मिला है चार ज़िंदगी का सफ़र

ZafarAli Memon

14 likes

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

"उजड़ते बसते घर" बहुत तूफ़ान हैं मेरी जान, न घर बना इस ख़ुश्क साहिल पे सुनो! ये घर नहीं बस रेत का छोटा घरौंदा है, न जाने कितने तूफ़ानों ने कितनी बार रौंदा है बहुत टूटा है और फिर टूट कर बनता बिगड़ता है, ये मेरी हसरतों को चैन देकर फिर उजड़ता है उजड़कर चल पड़ा ये फिर किसी उजड़े से साहिल पे तो क्या? तूफ़ान हैं मेरी जान पर! तू घर बना इसी ख़ुश्क साहिल पे

Anmol Mishra

9 likes

More from Daud Ghazi

ग़म-ए-हयात के नग़्मों का मैं मुग़न्नी हूँ ग़म-ए-हयात की लज़्ज़त का हूँ मैं शैदाई ये जज़्बा जो दिल-ए-बेताब से फ़ुज़ूँ-तर है कहीं से गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर उड़ा लाई नज़र को देता है ये रौशनी तजस्सुस की ये ग़म बनाता है दिल को दिल-ए-तमन्नाई ये राज़-हा-ए-तग-ओ-दौ को फ़ाश करता है ये राह-रौ को सिखाता है जादा-पैमाई इसी से गर्मी-ए-बज़्म-ए-हयात बाक़ी है यही है दहर के हर इंक़लाब का बानी कहीं न डस ले ये तन्हाई-ए-हयात मुझे तू ग़म से सीख ले आदाब-ए-बज़्म-आराई न कर हिसार-ए-मन-ओ-तू में अपना ग़म महदूद कि हो ये आम तो फिर ज़िंदगी है आफ़ाक़ी

Daud Ghazi

0 likes

जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत मिट्टी आग हवा और पानी दुश्मन सारे बन गए यार उस की आयत की तफ़्सीरें अब इतनी हैं कि अक़्ल है दंग लेकिन इक ऐसी है बात जिस से कि बनती है बात इन बे-गिनती तफ़सीरों की हर इक इंसाँ इंसाँ है जब इंसान ने पढ़ना सीखा पढ़ने लगा तहज़ीब की आयत गिरने लगीं दीवारें खुलने लगे दरवाज़े जिन लोगों ने दीवारें बनवाई हैं भूल गए तहज़ीब की आयत

Daud Ghazi

0 likes

ये तहज़ीब आख़िर बनाई है किस ने ज़माने की इज़्ज़त बढ़ाई है किस ने बना कर बदलने का मुख़्तार है कौन हयात-ए-मुसलसल का फ़नकार है कौन मशीनों में किस का लहू चल रहा है ये किस के लहू पर जहाँ पल रहा है बता दो ख़ुदा के लिए अब बता दो हक़ीक़त के चेहरे से पर्दा उठा दो

Daud Ghazi

0 likes

कारवाँ बढ़ता रहा बढ़ता रहा पै-ब-पै जादा-ब-जादा अपनी मंज़िल की तरफ़ सफ़-ब-सफ़ शाना-ब-शाना रहरवों को ले चला जेहद-ए-पैहम का हर इक इक़दाम हासिल की तरफ़ फिर न जाने क्या हुआ कैसी चली उल्टी हवा दफ़्अ'तन क़दमों के नग़्में सर्द से होने लगे थक गया अज़्म-ए-सफ़र उम्मीद का दम घुट गया शौक़ के सरगर्म जज़्बे राह में खोने लगे कारवाँ वालो दिलाए तुम को कौन इस का यक़ीं जिस की ख़्वाहिश में बढ़े हो तुम वो मंज़िल है क़रीं

Daud Ghazi

0 likes

इक लाश को इक चौराहे पर कुछ लोग खड़े थे घेरे हुए लगता था तमाशा हो जैसे सब अपनी अपनी कहते थे मुर्दे का पता बतलाने लगे उफ़ क़ौम का इक में'मार है ये सब झूट बड़ा अय्यार है ये रहबर है ये इक सालार है ये बकवास कि इक ग़द्दार है ये अफ़्सोस कि इक फ़नकार है ये क्या ख़ूब अरे बे-कार है ये नागाह कहीं से इक बुढ़िया लाठी के सहारे आगे बढ़ी और लाश पे गिर कर कहने लगी लोगों ये मेरा बेटा है ये मेरे जिगर का टुकड़ा है ये मेरी आँख का तारा है फ़ाक़ों ने दिया है इस को जनम ये सुब्ह-ए-अलम ये शाम-ए-सितम

Daud Ghazi

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Daud Ghazi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Daud Ghazi's nazm.