जो बार-आवर नहीं होता वो लम्हा कैसा होता है जो रंग-ओ-ख़ुशबूओं के आबगीने तोड़ देता है जो यादों की खुली आँखों को अपने सर्द हाथों के असर से मूँद देता है जो दिन की रौशनी में शब की आमेज़िश से ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है जो आसूदा ही होती हैं न अफ़्सुर्दा ही होती हैं कभी हँसती कभी बे-तरह रोती हैं जो रस्ता खोजती और मंज़िलों को भूल जाती हैं जो ज़िंदा हैं न मरती हैं जो डरती हैं अदा-ए-वक़्त से रुकती न चलती हैं फ़सील-ए-बे-यक़ीनी पर रखी शम्ओं' की सूरत आस में बुझती न जलती हैं जो ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है वो लम्हा कैसा होता है किसी पादाश की तकमील का हिस्सा कि हर्फ़-ए-कातिब-ए-तक़दीर होता है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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तुम्हारे फूल ताज़ा हैं मिरी सब उँगलियों पर उग रहे हैं और ये शाख़ें ये मेरी उँगलियाँ कैसी हरी हैं इन की शिरयानों में बहता रंग फूलों के लबों से बह रहा है क़तरा क़तरा एक बे-मौसम कहानी कह रहा है
Yasmeen Hameed
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अँधेरे से कशीद-ए-सुब्ह की रौशन गवाही माँगने से रात के लम्हे न घटते हैं न बढ़ते हैं कभी गहरे भँवर के बीच उठती दूरियों की धुँद में लिपटी किसी की साहिली आवाज़ दरिया का किनारा भी नहीं होती दुखों की अपनी इक तफ़्सीर होती है जो अपने लफ़्ज़ ख़ुद ईजाद करती है जो ख़्वाबों से उलझती है जो ख़्वाबों से ज़ियादा मो'तबर होती है लेकिन कश्फ़ का लम्हा मसाफ़त की हज़ारों मंज़िलों के बा'द आता है नुमूद-ए-गौहर-ए-कमयाब की साअ'त में ख़ाली सीपियों का ढेर बे-मा'नी नहीं होता
Yasmeen Hameed
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गई रुतों की कहानियाँ हैं निशानियाँ हैं वही खंडर है वही तमाशा-ए-अहद-ए-रफ़्ता ये ख़म नया है अलम नया है नए सवालों की बात कीजे जवाब दीजे कि आने वाले समय का आईना आप को भी इसी तरह मुनअ'किस करेगा
Yasmeen Hameed
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मैं हमेशा सोचती थी आँसू और दर्द हमें नफ़रतों से ही मिलते हैं अगर नफ़रतें न हों तो ये आँसू भी न हों और दर्द भी न हो मगर जब उस की मोहब्बत का चाहत का और ए'तिबार का मौसम बीता तब आँखें खुलीं एहसास हुआ कि दर्द सिर्फ़ नफ़रतों में ही नहीं होता मोहब्बत भी इंसान को सरापा दर्द बना देती है मोहब्बत दर्द देती है
Yasmeen Hameed
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मैं अपनी खोज में गुम थी कि मैं क्या हूँ अज़ल के हादसे का सिलसिला हूँ या फ़क़त मिट्टी की मूरत हूँ मुसख़्ख़र करने वाला ज़ेहन हूँ एहसास की धीमी सजल आवाज़ हूँ या अपने ख़ालिक़ की कोई ऐसी अदा हूँ जो उसे ख़ुद भा गई है तुम्हें पाया तो ये जाना कि मेरा भी कोई मफ़्हूम होगा तुम्हें खो कर मिरे मफ़्हूम की सूरत निखर आई फ़िशार-ए-बे-यक़ीनी ने वफ़ा के बा'द गुम्बद में अज़ल के कर्ब की सूरत में अपनी इब्तिदा देखी अबद के आइने में इंतिहा का नक़्श भी देखा ख़ुदा का अक्स भी देखा
Yasmeen Hameed
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