तुम्हारे फूल ताज़ा हैं मिरी सब उँगलियों पर उग रहे हैं और ये शाख़ें ये मेरी उँगलियाँ कैसी हरी हैं इन की शिरयानों में बहता रंग फूलों के लबों से बह रहा है क़तरा क़तरा एक बे-मौसम कहानी कह रहा है
Related Nazm
हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो
Ibn E Insha
22 likes
'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है
Sandeep Thakur
21 likes
"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
27 likes
मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
46 likes
तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
117 likes
More from Yasmeen Hameed
जो बार-आवर नहीं होता वो लम्हा कैसा होता है जो रंग-ओ-ख़ुशबूओं के आबगीने तोड़ देता है जो यादों की खुली आँखों को अपने सर्द हाथों के असर से मूँद देता है जो दिन की रौशनी में शब की आमेज़िश से ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है जो आसूदा ही होती हैं न अफ़्सुर्दा ही होती हैं कभी हँसती कभी बे-तरह रोती हैं जो रस्ता खोजती और मंज़िलों को भूल जाती हैं जो ज़िंदा हैं न मरती हैं जो डरती हैं अदा-ए-वक़्त से रुकती न चलती हैं फ़सील-ए-बे-यक़ीनी पर रखी शम्ओं' की सूरत आस में बुझती न जलती हैं जो ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है वो लम्हा कैसा होता है किसी पादाश की तकमील का हिस्सा कि हर्फ़-ए-कातिब-ए-तक़दीर होता है
Yasmeen Hameed
0 likes
अँधेरे से कशीद-ए-सुब्ह की रौशन गवाही माँगने से रात के लम्हे न घटते हैं न बढ़ते हैं कभी गहरे भँवर के बीच उठती दूरियों की धुँद में लिपटी किसी की साहिली आवाज़ दरिया का किनारा भी नहीं होती दुखों की अपनी इक तफ़्सीर होती है जो अपने लफ़्ज़ ख़ुद ईजाद करती है जो ख़्वाबों से उलझती है जो ख़्वाबों से ज़ियादा मो'तबर होती है लेकिन कश्फ़ का लम्हा मसाफ़त की हज़ारों मंज़िलों के बा'द आता है नुमूद-ए-गौहर-ए-कमयाब की साअ'त में ख़ाली सीपियों का ढेर बे-मा'नी नहीं होता
Yasmeen Hameed
0 likes
मैं अपनी खोज में गुम थी कि मैं क्या हूँ अज़ल के हादसे का सिलसिला हूँ या फ़क़त मिट्टी की मूरत हूँ मुसख़्ख़र करने वाला ज़ेहन हूँ एहसास की धीमी सजल आवाज़ हूँ या अपने ख़ालिक़ की कोई ऐसी अदा हूँ जो उसे ख़ुद भा गई है तुम्हें पाया तो ये जाना कि मेरा भी कोई मफ़्हूम होगा तुम्हें खो कर मिरे मफ़्हूम की सूरत निखर आई फ़िशार-ए-बे-यक़ीनी ने वफ़ा के बा'द गुम्बद में अज़ल के कर्ब की सूरत में अपनी इब्तिदा देखी अबद के आइने में इंतिहा का नक़्श भी देखा ख़ुदा का अक्स भी देखा
Yasmeen Hameed
0 likes
मैं हमेशा सोचती थी आँसू और दर्द हमें नफ़रतों से ही मिलते हैं अगर नफ़रतें न हों तो ये आँसू भी न हों और दर्द भी न हो मगर जब उस की मोहब्बत का चाहत का और ए'तिबार का मौसम बीता तब आँखें खुलीं एहसास हुआ कि दर्द सिर्फ़ नफ़रतों में ही नहीं होता मोहब्बत भी इंसान को सरापा दर्द बना देती है मोहब्बत दर्द देती है
Yasmeen Hameed
0 likes
गई रुतों की कहानियाँ हैं निशानियाँ हैं वही खंडर है वही तमाशा-ए-अहद-ए-रफ़्ता ये ख़म नया है अलम नया है नए सवालों की बात कीजे जवाब दीजे कि आने वाले समय का आईना आप को भी इसी तरह मुनअ'किस करेगा
Yasmeen Hameed
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Yasmeen Hameed.
Similar Moods
More moods that pair well with Yasmeen Hameed's nazm.







