nazmKuch Alfaaz

अँधेरे से कशीद-ए-सुब्ह की रौशन गवाही माँगने से रात के लम्हे न घटते हैं न बढ़ते हैं कभी गहरे भँवर के बीच उठती दूरियों की धुँद में लिपटी किसी की साहिली आवाज़ दरिया का किनारा भी नहीं होती दुखों की अपनी इक तफ़्सीर होती है जो अपने लफ़्ज़ ख़ुद ईजाद करती है जो ख़्वाबों से उलझती है जो ख़्वाबों से ज़ियादा मो'तबर होती है लेकिन कश्फ़ का लम्हा मसाफ़त की हज़ारों मंज़िलों के बा'द आता है नुमूद-ए-गौहर-ए-कमयाब की साअ'त में ख़ाली सीपियों का ढेर बे-मा'नी नहीं होता

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है ये सुब्ह सुब्ह की बात है

Gorakh Pandey

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"ख़ुदा का सवाल" मेरे रब की मुझ पर इनायत हुई कहूँ भी तो कैसे इबादत हुई हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँ क़लम बन गई है ख़ुदा की ज़बाँ मुख़ातिब है बंदे से परवरदिगार तू हुस्न-ए-चमन तू ही रंग-ए-बहार तू में'राज-ए-फ़न तू ही फन का सिंगार मुसव्विर हूँ मैं तू मेरा शाहकार ये सुब्हें ये शा में ये दिन और रात ये रंगीन दिलकश हसीं क़ायनात कि हूर-ओ-मलाइक व जिन्नात ने किया है तुझे अशरफ़ उल मख़लुक़ात मेरी अज़मतों का हवाला है तू तू ही रौशनी है उजाला है तू ये दुनिया जहाँ बज़्म-आराइयाँ ये महफ़िल ये मेले ये तन्हाइयाँ फ़लक का तुझे शामियाना दिया ज़मीं पर तुझे आब-ओ-दाना दिया मिले आबशारों से भी हौसले पहाड़ों मैं तुझ को दिए रास्ते ये पानी हवा और ये शम्स-ओ-क़मर ये मौज-ए-रवाँ ये किनारा भँवर ये शाख़ों पे ग़ुंचे चटकते हुए फ़लक पे सितारे चमकते हुए ये सब्ज़े ये फूलों भरी क्यारियाँ ये पंछी ये उड़ती हुई तितलियाँ ये शो'ला ये शबनम ये मिट्टी ये संग ये झरनों के बजते हुए जलतरंग ये झीलों में हँसते हुए से कँवल ये धरती पे मौसम की लिक्खी ग़ज़ल ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूप ये चेहरा ये क़द और ये रंग-ओ-रूप दरिंदों चरिंदों पे क़ाबू दिया तुझे भाई देकर के बाज़ू दिया बहन दी तुझे और शरीक-ए-सफ़र ये रिश्ता ये नाते घराना ये घर कि औलाद भी दी दिए वालिदैन अलिफ़ लाम मिम क़ाफ़ और ऐन ग़ैन ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शु'ऊर-ओ-नज़र ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर और उसपर किताब-ए-हिदायत भी दी नबी भी उतारे शरी'अत भी दी कि ख़बरें सभी कुछ हैं तेरे लिए बता क्या किया तू ने मेरे लिए

Abrar Kashif

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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तुम्हारे फूल ताज़ा हैं मिरी सब उँगलियों पर उग रहे हैं और ये शाख़ें ये मेरी उँगलियाँ कैसी हरी हैं इन की शिरयानों में बहता रंग फूलों के लबों से बह रहा है क़तरा क़तरा एक बे-मौसम कहानी कह रहा है

Yasmeen Hameed

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मैं अपनी खोज में गुम थी कि मैं क्या हूँ अज़ल के हादसे का सिलसिला हूँ या फ़क़त मिट्टी की मूरत हूँ मुसख़्ख़र करने वाला ज़ेहन हूँ एहसास की धीमी सजल आवाज़ हूँ या अपने ख़ालिक़ की कोई ऐसी अदा हूँ जो उसे ख़ुद भा गई है तुम्हें पाया तो ये जाना कि मेरा भी कोई मफ़्हूम होगा तुम्हें खो कर मिरे मफ़्हूम की सूरत निखर आई फ़िशार-ए-बे-यक़ीनी ने वफ़ा के बा'द गुम्बद में अज़ल के कर्ब की सूरत में अपनी इब्तिदा देखी अबद के आइने में इंतिहा का नक़्श भी देखा ख़ुदा का अक्स भी देखा

Yasmeen Hameed

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जो बार-आवर नहीं होता वो लम्हा कैसा होता है जो रंग-ओ-ख़ुशबूओं के आबगीने तोड़ देता है जो यादों की खुली आँखों को अपने सर्द हाथों के असर से मूँद देता है जो दिन की रौशनी में शब की आमेज़िश से ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है जो आसूदा ही होती हैं न अफ़्सुर्दा ही होती हैं कभी हँसती कभी बे-तरह रोती हैं जो रस्ता खोजती और मंज़िलों को भूल जाती हैं जो ज़िंदा हैं न मरती हैं जो डरती हैं अदा-ए-वक़्त से रुकती न चलती हैं फ़सील-ए-बे-यक़ीनी पर रखी शम्ओं' की सूरत आस में बुझती न जलती हैं जो ऐसी साअ'तें तख़्लीक़ करता है वो लम्हा कैसा होता है किसी पादाश की तकमील का हिस्सा कि हर्फ़-ए-कातिब-ए-तक़दीर होता है

Yasmeen Hameed

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गई रुतों की कहानियाँ हैं निशानियाँ हैं वही खंडर है वही तमाशा-ए-अहद-ए-रफ़्ता ये ख़म नया है अलम नया है नए सवालों की बात कीजे जवाब दीजे कि आने वाले समय का आईना आप को भी इसी तरह मुनअ'किस करेगा

Yasmeen Hameed

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वो हँसमुख और हसीं लड़की जो अब तक मुझ में ज़िंदा है नहीं बदली है वो अब तक उसी फ़ितरत में रौशन है उसी हैरत में ज़िंदा है गुज़रते वक़्त के हम-रह बहुत मंज़र बदलते हैं हुआ के रुख़ बदलते हैं हमारी ज़ात के यूँँ तो सभी मौसम बदलते हैं नहीं बदली है वो अब तक वो हँसमुख और हसीं लड़की मगर मैं जानती कब हूँ वो मुझ में मर चुकी है या है वो ज़िंदा

Yasmeen Hameed

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