"वो टूट गया कुछ ऐसे" वो टूट गया कुछ ऐसे अब जुड़ना बहुत था मुश्किल अब रास्ते भी न दिखते उसे न दिखते उसे अब साहिल वो ख़ुद में ही अब फँस गया जब दुखी हुआ तब हँस गया न ग़लती इस में उस की थी वो ख़ुशियों को तरस गया अब किस रास्ते वो जाए ये किस को वो समझाए जिसे समझना उसे चाहिए था वो ही उस सेे उलझ गया अब रोने को उस का दिल करे पर किस के काँधे पे रोए वो नींद न उस को आए अब जब राते को सोए वो इक नया सवेरा आएगा अब ये उम्मीदें ख़त्म हुई जो बची खुची सी ख़्वाहिश थी वो भी हृदय में दफ़न हुई
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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"दरीचा-हा-ए-ख़याल" चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ये सब दरीचा-हा-ए-ख़याल जो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैं बंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँ याद की इक किरन भी आ न सके चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हें और ख़ुद भी न याद आऊँ तुम्हें जैसे तुम सिर्फ़ इक कहानी थीं जैसे मैं सिर्फ़ इक फ़साना था
Jaun Elia
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे" सफ़ीना मेरी डगमगा रही है इक ऊँची सी लहर मेरी ओर आ रही है ये जल है जो तेरा मुझे डाले है घेरा चिढ़ाता है कह कर बे-चारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे कब से सफ़र में हूँ मैं तेरे साथ में जहाँ हूँ सुब्ह हूँ वहीं रात में चारों तरफ़ है इक गहरा सन्नाटा क्यूँ लाया तू मुझ को इस हालात में गर मुझ सेे है तुझ को थोड़ी भी मोहब्बत तो जाऊँ कहाँ कर इशारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे तू ने मुझे बहुत कुछ है सिखाया मैं भटका हुआ था मुझे ख़ुदस मिलाया भूलूँगा नहीं मैं वो हर एक पल जो मैं ने इस सफ़र में है तुझ संग बिताया मैं चाहता नहीं हूँ मगर जाना होगा है ज़मीं से किसी ने पुकारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे
Sarvjeet Singh
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"आज फिर" आज फिर तेरा चेहरा दिखा आज फिर दिल में उम्मीद जगी आज फिर तुझ सेे बात करने की मेरे दिल में इक रीझ जगी पर बोल न पाया कुछ भी मैं आज फिर मैं चुप-चाप रहा आज फिर तुझ सेे बातें बयाँ करने का ख़्वाब बस इक ख़्वाब रहा तेरे चेहरे को भी उतना जी भर के देख न पाया आज फिर मेरे दिल ने आँखों को बहुत उकसाया पर बातें बयाँ हुई न और आँखें चुप-चाप रही आज फिर वही पहले जैसी बेस्वादी मुलाक़ात रही
Sarvjeet Singh
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"तब याद हमारी आएगी" जब अंबर बादल बरसेगा तब तेरा आँगन तरसेगा जब धूप जहाँ को भाएगी तब तेरा चेहरा झुलसेगा जब तुझ को हर सूरत में मेरी सूरत नज़र ही आएगी जब सारा जग सो जाएगा और नींद तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी जब चारों तरफ़ उजाला होगा तब तेरे लिए सब काला होगा जब प्यार की प्यास लगेगी तुझ को तब ख़ाली हर एक प्याला होगा जो काटे थे हम ने संग में उन पलों से जब तेरा पाला होगा कर याद उन्हें तू रोएगी तब न कोई आँसू पोछने वाला होगा जब ख़ामोशी और बेचैनी तुझे अंदर से खा जाएगी जब तू जीना तो चाहेगी पर साँस तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी
Sarvjeet Singh
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