"तब याद हमारी आएगी" जब अंबर बादल बरसेगा तब तेरा आँगन तरसेगा जब धूप जहाँ को भाएगी तब तेरा चेहरा झुलसेगा जब तुझ को हर सूरत में मेरी सूरत नज़र ही आएगी जब सारा जग सो जाएगा और नींद तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी जब चारों तरफ़ उजाला होगा तब तेरे लिए सब काला होगा जब प्यार की प्यास लगेगी तुझ को तब ख़ाली हर एक प्याला होगा जो काटे थे हम ने संग में उन पलों से जब तेरा पाला होगा कर याद उन्हें तू रोएगी तब न कोई आँसू पोछने वाला होगा जब ख़ामोशी और बेचैनी तुझे अंदर से खा जाएगी जब तू जीना तो चाहेगी पर साँस तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी
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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
Tehzeeb Hafi
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है
Danish Balliavi
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"बचपन की मुहब्बत" तू था मेरे दिल का रहबर तू कितने दिन याद आएगा तू छोड़ गया है मुझ को पर तू कितने दिन याद आएगा हाँ प्यार हुआ था बचपन में इक़रार हुआ था बचपन में सुन बचपन का मेरे दिलबर तू कितना ख़ुश है मेरे बिना ये दिल रोता है तेरे बिना तू था मंज़िल का राह-गुज़र अब प्यार मुहब्बत है ही नहीं रोने के सिवा अब कुछ भी नहीं बस अश्कों से दामन है तर तेरी यादें तड़पाती है उलफ़त में आग लगाती है कब लेगा तू 'दानिश' की ख़बर
Danish Balliavi
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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"वो टूट गया कुछ ऐसे" वो टूट गया कुछ ऐसे अब जुड़ना बहुत था मुश्किल अब रास्ते भी न दिखते उसे न दिखते उसे अब साहिल वो ख़ुद में ही अब फँस गया जब दुखी हुआ तब हँस गया न ग़लती इस में उस की थी वो ख़ुशियों को तरस गया अब किस रास्ते वो जाए ये किस को वो समझाए जिसे समझना उसे चाहिए था वो ही उस सेे उलझ गया अब रोने को उस का दिल करे पर किस के काँधे पे रोए वो नींद न उस को आए अब जब राते को सोए वो इक नया सवेरा आएगा अब ये उम्मीदें ख़त्म हुई जो बची खुची सी ख़्वाहिश थी वो भी हृदय में दफ़न हुई
Sarvjeet Singh
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"ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे" सफ़ीना मेरी डगमगा रही है इक ऊँची सी लहर मेरी ओर आ रही है ये जल है जो तेरा मुझे डाले है घेरा चिढ़ाता है कह कर बे-चारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे कब से सफ़र में हूँ मैं तेरे साथ में जहाँ हूँ सुब्ह हूँ वहीं रात में चारों तरफ़ है इक गहरा सन्नाटा क्यूँ लाया तू मुझ को इस हालात में गर मुझ सेे है तुझ को थोड़ी भी मोहब्बत तो जाऊँ कहाँ कर इशारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे तू ने मुझे बहुत कुछ है सिखाया मैं भटका हुआ था मुझे ख़ुदस मिलाया भूलूँगा नहीं मैं वो हर एक पल जो मैं ने इस सफ़र में है तुझ संग बिताया मैं चाहता नहीं हूँ मगर जाना होगा है ज़मीं से किसी ने पुकारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे
Sarvjeet Singh
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"आज फिर" आज फिर तेरा चेहरा दिखा आज फिर दिल में उम्मीद जगी आज फिर तुझ सेे बात करने की मेरे दिल में इक रीझ जगी पर बोल न पाया कुछ भी मैं आज फिर मैं चुप-चाप रहा आज फिर तुझ सेे बातें बयाँ करने का ख़्वाब बस इक ख़्वाब रहा तेरे चेहरे को भी उतना जी भर के देख न पाया आज फिर मेरे दिल ने आँखों को बहुत उकसाया पर बातें बयाँ हुई न और आँखें चुप-चाप रही आज फिर वही पहले जैसी बेस्वादी मुलाक़ात रही
Sarvjeet Singh
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