"ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे" सफ़ीना मेरी डगमगा रही है इक ऊँची सी लहर मेरी ओर आ रही है ये जल है जो तेरा मुझे डाले है घेरा चिढ़ाता है कह कर बे-चारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे कब से सफ़र में हूँ मैं तेरे साथ में जहाँ हूँ सुब्ह हूँ वहीं रात में चारों तरफ़ है इक गहरा सन्नाटा क्यूँ लाया तू मुझ को इस हालात में गर मुझ सेे है तुझ को थोड़ी भी मोहब्बत तो जाऊँ कहाँ कर इशारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे तू ने मुझे बहुत कुछ है सिखाया मैं भटका हुआ था मुझे ख़ुदस मिलाया भूलूँगा नहीं मैं वो हर एक पल जो मैं ने इस सफ़र में है तुझ संग बिताया मैं चाहता नहीं हूँ मगर जाना होगा है ज़मीं से किसी ने पुकारा मुझे ओ सागर तू दे दे किनारा मुझे
Related Nazm
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
216 likes
"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
111 likes
"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
180 likes
More from Sarvjeet Singh
"आज फिर" आज फिर तेरा चेहरा दिखा आज फिर दिल में उम्मीद जगी आज फिर तुझ सेे बात करने की मेरे दिल में इक रीझ जगी पर बोल न पाया कुछ भी मैं आज फिर मैं चुप-चाप रहा आज फिर तुझ सेे बातें बयाँ करने का ख़्वाब बस इक ख़्वाब रहा तेरे चेहरे को भी उतना जी भर के देख न पाया आज फिर मेरे दिल ने आँखों को बहुत उकसाया पर बातें बयाँ हुई न और आँखें चुप-चाप रही आज फिर वही पहले जैसी बेस्वादी मुलाक़ात रही
Sarvjeet Singh
2 likes
"वो टूट गया कुछ ऐसे" वो टूट गया कुछ ऐसे अब जुड़ना बहुत था मुश्किल अब रास्ते भी न दिखते उसे न दिखते उसे अब साहिल वो ख़ुद में ही अब फँस गया जब दुखी हुआ तब हँस गया न ग़लती इस में उस की थी वो ख़ुशियों को तरस गया अब किस रास्ते वो जाए ये किस को वो समझाए जिसे समझना उसे चाहिए था वो ही उस सेे उलझ गया अब रोने को उस का दिल करे पर किस के काँधे पे रोए वो नींद न उस को आए अब जब राते को सोए वो इक नया सवेरा आएगा अब ये उम्मीदें ख़त्म हुई जो बची खुची सी ख़्वाहिश थी वो भी हृदय में दफ़न हुई
Sarvjeet Singh
0 likes
"तब याद हमारी आएगी" जब अंबर बादल बरसेगा तब तेरा आँगन तरसेगा जब धूप जहाँ को भाएगी तब तेरा चेहरा झुलसेगा जब तुझ को हर सूरत में मेरी सूरत नज़र ही आएगी जब सारा जग सो जाएगा और नींद तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी जब चारों तरफ़ उजाला होगा तब तेरे लिए सब काला होगा जब प्यार की प्यास लगेगी तुझ को तब ख़ाली हर एक प्याला होगा जो काटे थे हम ने संग में उन पलों से जब तेरा पाला होगा कर याद उन्हें तू रोएगी तब न कोई आँसू पोछने वाला होगा जब ख़ामोशी और बेचैनी तुझे अंदर से खा जाएगी जब तू जीना तो चाहेगी पर साँस तुझे न आएगी तब याद हमारी आएगी तब याद हमारी आएगी
Sarvjeet Singh
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Sarvjeet Singh.
Similar Moods
More moods that pair well with Sarvjeet Singh's nazm.







