"जंग" ये जंग कभी न ख़त्म होगी चल हम दुनिया बसाएँ और कहीं इस शहर की चिड़ियाँ सहम गई हैं वो उड़ के जाती हैं और कहीं यहाँ गूँज रही है तोपों की सदाएँ चल हम गीत सुनाएँ और कहीं ये दुनिया है काँटो से भरी हम फूल खिलाएँ और कहीं यहाँ नफ़रत का बारूद जला हैं हम मोहब्बत महकाएँ और कहीं सब बस्तियाँ जल के राख हुई चल आशियाँ बनाएँ और कहीं ये लोग हैं जिस्म चबाने के लिए हम फसल उगाएँ और कहीं हर धड़कन में शोर है बरपा चल सुकून तलाशें और कहीं
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दौलत ना अता करना मौला, शोहरत ना अता करना मौला बस इतना अता करना चाहे जन्नत ना अता करना मौला शम्मा-ए-वतन की लौ पर जब कुर्बान पतंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो बस एक सदा ही सुनें सदा बर्फ़ीली मस्त हवाओं में बस एक दुआ ही उठे सदा जलते-तपते सेहराओं में जीते-जी इस का मान रखें मर कर मर्यादा याद रहे हम रहें कभी ना रहें मगर इस की सज-धज आबाद रहे जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो गीता का ज्ञान सुने ना सुनें, इस धरती का यशगान सुनें हम सबद-कीर्तन सुन ना सकें भारत मां का जयगान सुनें परवरदिगार,मैं तेरे द्वार पर ले पुकार ये आया हूँ चाहे अज़ान ना सुनें कान पर जय-जय हिन्दुस्तान सुनें जन-मन में उच्छल देश प्रेम का जलधि तरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो होंठों पर गंगा हो, हाथों में तिरंगा हो
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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"जुदाई" जिन दिनों में तुम ने देखा था मुझे मैं उन दिनों किसी गुलाब जैसा खिल रहा था महक रहा था तुम्हारे इश्क़ का गुलाबी जाम मेरे नर्म चेहरे पे बह रहा था मगर अब के यूँँ है बिछड़ के तुम सेे तुम्हारे हिज्र ए मलाल से मैं उजड़ गया हूँ तुम्हारी क़िताब में रखे हुए गुलाब जैसा मैं इन दिनों सड़ रहा हूँ तुम्हारे इंतिज़ार की सर्द राहों पर पत्ती पत्ती बिखर रहा हूँ मैं जीता जागता एक लड़का साँस दर साँस मर रहा हूँ
ALI ZUHRI
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"निसा" दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती, मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती, उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं, ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं, उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं, मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं, उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा, ख़ुदा ने, कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है, वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा
ALI ZUHRI
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"मोहब्बत" हम जो तिरे दिल में समाए है यहाँ से हिजरत कर जाएँगे एक वक़्त कयामत को आना है ये सितारे भुझा दिए जाएँगे मेरी आँखें एक दरिया है हम कभी सेलाब लाएँगे तुम अगर कहो हम से मिलना है हम पहाड़ों का सीना चीर कर आएँगे मौत आने की हज़ार क़िस्में हैं हम मोहब्बत में मारे जाएँगे
ALI ZUHRI
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"क्या लगती हो" मैं जब कोई नज़्म कहता हूँ तुम उस का उनवान लगती हो मुझ सेे मिरी बातें करती हो कौन हो तुम मेरी क्या लगती हो कितनी कम मुयस्सर हो तुम मुझ को फिर भी सारी की सारी लगती हो तुम्हें तितलियाँ तलाश करती हैं बारिशों में भीगा गुलाब लगती हो सितारे तुम्हारा तवाफ़ करते हैं फ़लक पर चमकता चाँद लगती हो आँखें ग़ज़ल हिरणी ज़ुल्फ़ घटा सावन पहाड़ी पर रक़्स करता बादल लगती हो हर एक बात वली सी करती हो जैसे किसी मज़ार की दुआ लगती हो ये हुस्न-ए-आतिश दहकता शबाब कितने ही कोह-ए-तूर जलाती हो तुम्हें ख़ामोशियाँ इस तरह पुकारती हैं जैसे गाँव में मग़रिब की अज़ान लगती हो अब क्या ज़ेहमत करें ये कहने में फ़लक से उतरा हुआ फरिश्ता लगती हो
ALI ZUHRI
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