"निसा" दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती, मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती, उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं, ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं, उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं, मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं, उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा, ख़ुदा ने, कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है, वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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तुम हमारे लिए तुम हमारे लिए अर्चना बन गई हम तुम्हारे लिए एक दर्पण प्रिये तुम मिलो तो सही हाल पूछो मेरा हम न रो दें तो कह देना पत्थर प्रिये प्यार मिलना नहीं था अगर भाग्य में देवताओं ने हम सेे ये छल क्यूँ किया मेरे दिल में भरी रेत ही रेत थी दे के अमृत ये हम को विकल क्यूँ किया अप्सरा हो तो हो पर हमारे लिए तुम ही सुंदर सुकोमल सुघर हो प्रिये देवताओं के गणितीय संसार में ऐसा भी है नहीं कोई अच्छा न था हम अगर इस जनम भी नहीं मिल सके सब कहेंगे यही प्यार सच्चा न था कायरों को कभी प्यार मिलता नहीं फ़ैसला कोई ले लो कि डटकर प्रिये मम्मी कहती थीं चंदा बहुत दूर है चाँद से आगे हम को सितारा लगा यूँँ तो चेहरे ही चेहरे थे दुनिया में पर एक तेरा ही चेहरा पियारा लगा पलकों पे मेरी रख कर क़दम तुम चलो पॉंव में चुभ न जाए कि कंकड़ प्रिये
Rakesh Mahadiuree
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा
ALI ZUHRI
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"मर रही हूँ" उसे कहना मैं मर रही हूँ आँखें अभी खुली हुई हैं वक़्त मिले तो लोट आए सांसे अभी रुकी नहीं हैं बातें पुरानी भुला चुकी हूँ ख़त सभी जला चुकी हूँ सच तुझे बता रही हूँ इंतिज़ार तिरा मैं कर रही हूँ मैं धीरे धीरे मर रही हूँ याद तूझे बस कर रही हूँ वजूद तिरा यहीं कहीं है यक़ीं मैं ख़ुद को दिला रही हूँ
ALI ZUHRI
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"जुदाई" जिन दिनों में तुम ने देखा था मुझे मैं उन दिनों किसी गुलाब जैसा खिल रहा था महक रहा था तुम्हारे इश्क़ का गुलाबी जाम मेरे नर्म चेहरे पे बह रहा था मगर अब के यूँँ है बिछड़ के तुम सेे तुम्हारे हिज्र ए मलाल से मैं उजड़ गया हूँ तुम्हारी क़िताब में रखे हुए गुलाब जैसा मैं इन दिनों सड़ रहा हूँ तुम्हारे इंतिज़ार की सर्द राहों पर पत्ती पत्ती बिखर रहा हूँ मैं जीता जागता एक लड़का साँस दर साँस मर रहा हूँ
ALI ZUHRI
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"जंग" ये जंग कभी न ख़त्म होगी चल हम दुनिया बसाएँ और कहीं इस शहर की चिड़ियाँ सहम गई हैं वो उड़ के जाती हैं और कहीं यहाँ गूँज रही है तोपों की सदाएँ चल हम गीत सुनाएँ और कहीं ये दुनिया है काँटो से भरी हम फूल खिलाएँ और कहीं यहाँ नफ़रत का बारूद जला हैं हम मोहब्बत महकाएँ और कहीं सब बस्तियाँ जल के राख हुई चल आशियाँ बनाएँ और कहीं ये लोग हैं जिस्म चबाने के लिए हम फसल उगाएँ और कहीं हर धड़कन में शोर है बरपा चल सुकून तलाशें और कहीं
ALI ZUHRI
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"दोस्त" ये बात तुझ सेे छुपी नहीं तू रूह है मेरी साया नहीं तू ने ये कैसे कह दिया तू दोस्त है हम सफ़र नहीं क्यूँँ तुझे आता समझ नहीं तू राह है मेरी मंज़िल नहीं
ALI ZUHRI
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