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"मर रही हूँ" उसे कहना मैं मर रही हूँ आँखें अभी खुली हुई हैं वक़्त मिले तो लोट आए सांसे अभी रुकी नहीं हैं बातें पुरानी भुला चुकी हूँ ख़त सभी जला चुकी हूँ सच तुझे बता रही हूँ इंतिज़ार तिरा मैं कर रही हूँ मैं धीरे धीरे मर रही हूँ याद तूझे बस कर रही हूँ वजूद तिरा यहीं कहीं है यक़ीं मैं ख़ुद को दिला रही हूँ

ALI ZUHRI9 Likes

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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"बाबा" तेरे कमरे से जो आती थी हमेशा बाबा वो आवाज़ पुकारती नहीं मुझ को बाबा तेरे काँधों पर बैठ कर जो देखे थे कभी वो मेले लगते हैं अब सूने विरान बाबा ये ज़माने की निगाहें सौदागर है वहशी है ये नोच खाएगी जिस्मों को हमारे बाबा तू घर में हमारे माली-ए-गुलशन था हम तो तेरे आँगन की कली थे बाबा तेरे काँधों पर आख़िरी वक़्त रोना था हमें तेरे साए में इस घर से विदा होना था बाबा तेरी ही निशानी है तुझ सा दिखता भी है भाई भी कब बेटियों सा समझता है बाबा तू जो गया माँ के चेहरे की रंगत भी ले गया वो भी उदास है बहुत कम बोलती है बाबा दिल से अब बस यही दुआ निकलती है हमें तुम मुस्कुराते मिलो जन्नत में बाबा

ALI ZUHRI

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"जुदाई" जिन दिनों में तुम ने देखा था मुझे मैं उन दिनों किसी गुलाब जैसा खिल रहा था महक रहा था तुम्हारे इश्क़ का गुलाबी जाम मेरे नर्म चेहरे पे बह रहा था मगर अब के यूँँ है बिछड़ के तुम सेे तुम्हारे हिज्र ए मलाल से मैं उजड़ गया हूँ तुम्हारी क़िताब में रखे हुए गुलाब जैसा मैं इन दिनों सड़ रहा हूँ तुम्हारे इंतिज़ार की सर्द राहों पर पत्ती पत्ती बिखर रहा हूँ मैं जीता जागता एक लड़का साँस दर साँस मर रहा हूँ

ALI ZUHRI

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"जंग" ये जंग कभी न ख़त्म होगी चल हम दुनिया बसाएँ और कहीं इस शहर की चिड़ियाँ सहम गई हैं वो उड़ के जाती हैं और कहीं यहाँ गूँज रही है तोपों की सदाएँ चल हम गीत सुनाएँ और कहीं ये दुनिया है काँटो से भरी हम फूल खिलाएँ और कहीं यहाँ नफ़रत का बारूद जला हैं हम मोहब्बत महकाएँ और कहीं सब बस्तियाँ जल के राख हुई चल आशियाँ बनाएँ और कहीं ये लोग हैं जिस्म चबाने के लिए हम फसल उगाएँ और कहीं हर धड़कन में शोर है बरपा चल सुकून तलाशें और कहीं

ALI ZUHRI

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"निसा" दुनिया के रंगीन मज़ाहिरों से हट कर,जब कभी मेरी नज़र उस सादा लिबास लड़की पे अगर पड़ती, मेरे दिल से हसरतें निकलती और उमंगें झूम उठती, उस लड़की के नाक-नक़्श बिल्कुल भी बनावटी नहीं उस के बदन के नुक़ूश में कुछ भी सजावटी नहीं, ख़ुदा की क़सम दुनिया के मज़ाहिरों में उस के सिवा कुछ भी देखने को नहीं, उसे इस दुनिया की रंगीनियों की कोई परवाह ही नहीं, मानो दुनिया से उसे कोई राब्ता ही नहीं, उसे ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत की निशानी के लिए बनाया होगा उस का पैकर तहतुस्सरा की मिट्टी से तराशा होगा उस की बुलंदी पे फ़रिश्तों ने भी सर झुकाया होगा वो तो ऐसी चीज़ है जिसे देख कर ख़ुदा को ख़ुद अपनी कुन पे रश्क आया होगा, ख़ुदा ने, कोयल को उस की समा'अत के आशार बख़्शें हैं और पेड़ों को उस की बाँहों के हार बख़्शें हैं ये घटा उस की ज़ुल्फ़ों की छाँव में रह कर काली होती है उस के आँचल से ही शाम पर लाली होती है उस के हाथों की लकीरों पर दुनिया नक़्श है जन्नत की हूरों में भी उस का ही अक्स है उस की आँखों की बीनाई से सुब्ह,रात रौशन है उस के पहलू में सातों बर्र-ए-आज़मों के मौसम हैं उस के आरिज़ की पुरनमीं से गुलाब महकते हैं उस की मुस्कुराहट से जंगल के पंछी चहकते हैं जुगनू ने उस की ज़ीनत पाई है मेहँदी ने भी उस के हाथों पे रंगत पाई है मैं उस लड़की की वज़ाहत अपनी नज़्मों में करुँ भी तो कैसे करुँ कि मैं ने उसे देखा ही बहुत कम है, वो रब का अहसान है या तुक़ज़्ज़िबान इस पे क्या झगड़ना की वो नास है या निसा वो तो ज़िंदगी को ज़रूरी है जैसे कि निज़ाम-ए-फिज़ा

ALI ZUHRI

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"दोस्त" ये बात तुझ सेे छुपी नहीं तू रूह है मेरी साया नहीं तू ने ये कैसे कह दिया तू दोस्त है हम सफ़र नहीं क्यूँँ तुझे आता समझ नहीं तू राह है मेरी मंज़िल नहीं

ALI ZUHRI

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