nazmKuch Alfaaz

"साल-ए-नौ" ये किस ने फोन पे दी साल-ए-नौ की तहनियत मुझ को तमन्ना रक़्स करती है तख़य्युल गुनगुनाता है तसव्वुर इक नए एहसास की जन्नत में ले आया निगाहों में कोई रंगीन चेहरा मुस्कुराता है जबीं की छूट पड़ती है फ़लक के माह-पारों पर ज़िया फैली हुई है सारा आलम जगमगाता है शफ़क़ के नूर से रौशन हैं मेहराबें फ़ज़ाओं की सुरय्या की जबीं ज़ोहरा का आरिज़ तिम्तिमाता है पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है ज़मीं ने फिर नए सर से नया रख़्त-ए-सफ़र बाँधा ख़ुशी में हर क़दम पर आफ़्ताब आँखें बिछाता है हज़ारों ख़्वाहिशें अंगड़ाइयाँ लेती हैं सीने में जहान-ए-आरज़ू का ज़र्रा ज़र्रा गुनगुनाता है उमीदें डाल कर आँखों में आँखें मुस्कुराती हैं ज़माना जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से अफ़्साने सुनाता है मसर्रत के जवाँ मल्लाह कश्ती ले के निकले हैं ग़मों के ना-ख़ुदाओं का सफ़ीना डगमगाता है ख़ुशी मुझ को भी है लेकिन मैं ये महसूस करता हूँ मसर्रत के इस आईने में ग़म भी झिलमिलाता है हमारे दौर-ए-महकूमी की मुद्दत घटती जाती है ग़ुलामी के ज़माने में इज़ाफ़ा होता जाता है यही अंदाज़ गर बाक़ी हैं अपनी सुस्त-गामी के न जाने और कितने साल आएँगे ग़ुलामी के

Related Nazm

"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

37 likes

"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

25 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

21 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

More from Ali Sardar Jafri

पूछता है तो कि कब और किस तरह आती हूँ मैं गोद में नाकामियों के परवरिश पाती हूँ मैं सिर्फ़ वो मख़्सूस सीने हैं मिरी आराम-गाह आरज़ू की तरह रह जाती है जिन में घुट के आह अहल-ए-ग़म के साथ उन का दर्द-ओ-ग़म सहती हूँ मैं काँपते होंटों पे बन कर बद-दुआ' रहती हूँ मैं रक़्स करती हैं इशारों पर मिरे मौत-ओ-हयात देखती रहती हूँ मैं हर-वक़्त नब्ज़-ए-काएनात ख़ुद-फ़रेबी बढ़ के जब बनती है एहसास-ए-शुऊ'र जब जवाँ होता है अहल-ए-ज़र के तेवर में ग़ुरूर मुफ़्लिसी से करते हैं जब आदमियत को जुदा जब लहू पीते हैं तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के ख़ुदा भूत बन कर नाचता है सर पे जब क़ौमी वक़ार ले के मज़हब की सिपर आता है जब सरमाया-दार रास्ते जब बंद होते हैं दु'आओं के लिए आदमी लड़ता है जब झूटे ख़ुदाओं के लिए ज़िंदगी इंसाँ की कर देता है जब इंसाँ हराम जब उसे क़ानून-ए-फ़ितरत का अता होता है नाम अहरमन फिरता है जब अपना दहन खोले हुए आसमाँ से मौत जब आती है पर तोले हुए जब किसानों की निगाहों से टपकता है हिरास फूटने लगती है जब मज़दूर के ज़ख़्मों से यास सब्र-ए-अय्यूबी का जब लबरेज़ होता है सुबू सोज़-ए-ग़म से खौलता है जब ग़ुलामों का लहू ग़ासिबों से बढ़ के जब करता है हक़ अपना सवाल जब नज़र आता है मज़लूमों के चेहरों पर जलाल तफ़रक़ा पड़ता है जब दुनिया में नस्ल-ओ-रंग का ले के मैं आती हूँ परचम इन्क़िलाब-ओ-जंग का हाँ मगर जब टूट जाती है हवादिस की कमंद जब कुचल देता है हर शय को बग़ावत का समंद जब निगल लेता है तूफ़ाँ बढ़ के कश्ती नूह की घुट के जब इंसान में रह जाती है अज़्मत रूह की दूर हो जाती है जब मज़दूरों के दिल की जलन जब तबस्सुम बन के होंटों पर सिमटती है थकन जब उभरता है उफ़ुक़ से ज़िंदगी का आफ़्ताब जब निखरता है लहू की आग में तप कर शबाब नस्ल क़ौमिय्यत कलीसा सल्तनत तहज़ीब-ओ-रंग रौंद चुकती है जब इन सब को जवानी की उमंग सुब्ह के ज़र्रीं तबस्सुम में अयाँ होती हूँ मैं रिफ़अत-ए-अर्श-ए-बरीं से पर-फ़िशाँ होती हूँ मैं

Ali Sardar Jafri

1 likes

उठो हिन्द के बाग़बानो उठो उठो इंक़िलाबी जवानो उठो किसानों उठो काम-गारो उठो नई ज़िंदगी के शरारो उठो उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से उठो मालवे और मेवात से महाराष्ट्र और गुजरात से अवध के चमन से चहकते उठो गुलों की तरह से महकते उठो उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब उठो जैसे दरिया में उठती है मौज उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए कड़कते गरजते बरसते हुए ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो

Ali Sardar Jafri

14 likes

ग़ुलाम तुम भी थे यारों ग़ुलाम हम भी थे नहा के ख़ून में आई थी फ़स्ले-आज़ादी मज़ा तो तब था कि जब मिल कर इलाज-ए-जां करते ख़ुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसितां करते हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक़ होते तो जश्न-ए-आशियां करते तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बर्दोश हम आएँ सुब्ह-ए-बनारस की रौशनी ले कर हिमालय की हवाओं की ताज़गी ले कर और उस के बा'द ये पूछें कौन दुश्मन है ?

Ali Sardar Jafri

1 likes

फिर इक दिन ऐसा आएगा आँखों के दीए बुझ जाएँगे हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे और बर्ग-ए-ज़बांसे नुत्क़ ओ सदा की हर तितली उड़ जाएगी इक काले समुंदर की तह में कलियों की तरह से खिलती हुई फूलों की तरह से हंसती हुई सारी शक्लें खो जाएंगी ख़ूंकी गर्दिश दिल की धड़कन सब रागनियां सो जाएंगी और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर हंसती हुई हीरे की ये कनी ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं इस की सुब्हें इस की शा में बे-जाने हुए बे-समझे हुए इक मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-इंसांपर शबनम की तरह रो जाएंगी हर चीज़ भुला दी जाएगी यादों के हसीं बुत-ख़ाने से हर चीज़ उठा दी जाएगी फिर कोई नहीं ये पूछेगा 'सरदार' कहाँ है महफ़िल में लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा बच्चों के दहन से बोलूंगा चिड़ियों की ज़बां से गाऊंगा जब बीज हंसेंगे धरती में और कोंपलें अपनी उँगली से मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी मैं पत्ती पत्ती कली कली अपनी आँखें फिर खोलूंगा सरसब्ज़ हथेली पर ले कर शबनम के क़तरे तौलूंगा मैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़ल अंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा रुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह हर आंचल से छिन जाऊँगा जाड़ों की हवाएंदामन में जब फ़स्ल-ए-ख़िज़ांको लाएंगी रह-रौ के जवां क़दमों के तले सूखे हुए पत्तों से मेरे हँसने की सदाएंआएंगी धरती की सुनहरी सब नदियाँ आकाश की नीली सब झीलें हस्ती से मिरी भर जाएंगी और सारा ज़माना देखेगा हर क़िस्सा मिरा अफ़्साना है हर आशिक़ है 'सरदार' यहाँ हर माशूक़ा 'सुलताना' है मैं एक गुरेज़ांलम्हा हूँ अय्याम के अफ़्सूं-ख़ाने में मैं एक तड़पता क़तरा हूँ मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है माज़ी की सुराही के दिल से मुस्तक़बिल के पैमाने में मैं सोता हूंऔर जागता हूँ और जाग के फिर सो जाता हूँ सदियों का पुराना खेल हूं मैं मैं मर के अमर हो जाता हूँ

Ali Sardar Jafri

4 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ali Sardar Jafri.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ali Sardar Jafri's nazm.