फिर इक दिन ऐसा आएगा आँखों के दीए बुझ जाएँगे हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे और बर्ग-ए-ज़बांसे नुत्क़ ओ सदा की हर तितली उड़ जाएगी इक काले समुंदर की तह में कलियों की तरह से खिलती हुई फूलों की तरह से हंसती हुई सारी शक्लें खो जाएंगी ख़ूंकी गर्दिश दिल की धड़कन सब रागनियां सो जाएंगी और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर हंसती हुई हीरे की ये कनी ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं इस की सुब्हें इस की शा में बे-जाने हुए बे-समझे हुए इक मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-इंसांपर शबनम की तरह रो जाएंगी हर चीज़ भुला दी जाएगी यादों के हसीं बुत-ख़ाने से हर चीज़ उठा दी जाएगी फिर कोई नहीं ये पूछेगा 'सरदार' कहाँ है महफ़िल में लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा बच्चों के दहन से बोलूंगा चिड़ियों की ज़बां से गाऊंगा जब बीज हंसेंगे धरती में और कोंपलें अपनी उँगली से मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी मैं पत्ती पत्ती कली कली अपनी आँखें फिर खोलूंगा सरसब्ज़ हथेली पर ले कर शबनम के क़तरे तौलूंगा मैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़ल अंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा रुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह हर आंचल से छिन जाऊँगा जाड़ों की हवाएंदामन में जब फ़स्ल-ए-ख़िज़ांको लाएंगी रह-रौ के जवां क़दमों के तले सूखे हुए पत्तों से मेरे हँसने की सदाएंआएंगी धरती की सुनहरी सब नदियाँ आकाश की नीली सब झीलें हस्ती से मिरी भर जाएंगी और सारा ज़माना देखेगा हर क़िस्सा मिरा अफ़्साना है हर आशिक़ है 'सरदार' यहाँ हर माशूक़ा 'सुलताना' है मैं एक गुरेज़ांलम्हा हूँ अय्याम के अफ़्सूं-ख़ाने में मैं एक तड़पता क़तरा हूँ मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है माज़ी की सुराही के दिल से मुस्तक़बिल के पैमाने में मैं सोता हूंऔर जागता हूँ और जाग के फिर सो जाता हूँ सदियों का पुराना खेल हूं मैं मैं मर के अमर हो जाता हूँ
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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पूछता है तो कि कब और किस तरह आती हूँ मैं गोद में नाकामियों के परवरिश पाती हूँ मैं सिर्फ़ वो मख़्सूस सीने हैं मिरी आराम-गाह आरज़ू की तरह रह जाती है जिन में घुट के आह अहल-ए-ग़म के साथ उन का दर्द-ओ-ग़म सहती हूँ मैं काँपते होंटों पे बन कर बद-दुआ' रहती हूँ मैं रक़्स करती हैं इशारों पर मिरे मौत-ओ-हयात देखती रहती हूँ मैं हर-वक़्त नब्ज़-ए-काएनात ख़ुद-फ़रेबी बढ़ के जब बनती है एहसास-ए-शुऊ'र जब जवाँ होता है अहल-ए-ज़र के तेवर में ग़ुरूर मुफ़्लिसी से करते हैं जब आदमियत को जुदा जब लहू पीते हैं तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के ख़ुदा भूत बन कर नाचता है सर पे जब क़ौमी वक़ार ले के मज़हब की सिपर आता है जब सरमाया-दार रास्ते जब बंद होते हैं दु'आओं के लिए आदमी लड़ता है जब झूटे ख़ुदाओं के लिए ज़िंदगी इंसाँ की कर देता है जब इंसाँ हराम जब उसे क़ानून-ए-फ़ितरत का अता होता है नाम अहरमन फिरता है जब अपना दहन खोले हुए आसमाँ से मौत जब आती है पर तोले हुए जब किसानों की निगाहों से टपकता है हिरास फूटने लगती है जब मज़दूर के ज़ख़्मों से यास सब्र-ए-अय्यूबी का जब लबरेज़ होता है सुबू सोज़-ए-ग़म से खौलता है जब ग़ुलामों का लहू ग़ासिबों से बढ़ के जब करता है हक़ अपना सवाल जब नज़र आता है मज़लूमों के चेहरों पर जलाल तफ़रक़ा पड़ता है जब दुनिया में नस्ल-ओ-रंग का ले के मैं आती हूँ परचम इन्क़िलाब-ओ-जंग का हाँ मगर जब टूट जाती है हवादिस की कमंद जब कुचल देता है हर शय को बग़ावत का समंद जब निगल लेता है तूफ़ाँ बढ़ के कश्ती नूह की घुट के जब इंसान में रह जाती है अज़्मत रूह की दूर हो जाती है जब मज़दूरों के दिल की जलन जब तबस्सुम बन के होंटों पर सिमटती है थकन जब उभरता है उफ़ुक़ से ज़िंदगी का आफ़्ताब जब निखरता है लहू की आग में तप कर शबाब नस्ल क़ौमिय्यत कलीसा सल्तनत तहज़ीब-ओ-रंग रौंद चुकती है जब इन सब को जवानी की उमंग सुब्ह के ज़र्रीं तबस्सुम में अयाँ होती हूँ मैं रिफ़अत-ए-अर्श-ए-बरीं से पर-फ़िशाँ होती हूँ मैं
Ali Sardar Jafri
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"साल-ए-नौ" ये किस ने फोन पे दी साल-ए-नौ की तहनियत मुझ को तमन्ना रक़्स करती है तख़य्युल गुनगुनाता है तसव्वुर इक नए एहसास की जन्नत में ले आया निगाहों में कोई रंगीन चेहरा मुस्कुराता है जबीं की छूट पड़ती है फ़लक के माह-पारों पर ज़िया फैली हुई है सारा आलम जगमगाता है शफ़क़ के नूर से रौशन हैं मेहराबें फ़ज़ाओं की सुरय्या की जबीं ज़ोहरा का आरिज़ तिम्तिमाता है पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है ज़मीं ने फिर नए सर से नया रख़्त-ए-सफ़र बाँधा ख़ुशी में हर क़दम पर आफ़्ताब आँखें बिछाता है हज़ारों ख़्वाहिशें अंगड़ाइयाँ लेती हैं सीने में जहान-ए-आरज़ू का ज़र्रा ज़र्रा गुनगुनाता है उमीदें डाल कर आँखों में आँखें मुस्कुराती हैं ज़माना जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ से अफ़्साने सुनाता है मसर्रत के जवाँ मल्लाह कश्ती ले के निकले हैं ग़मों के ना-ख़ुदाओं का सफ़ीना डगमगाता है ख़ुशी मुझ को भी है लेकिन मैं ये महसूस करता हूँ मसर्रत के इस आईने में ग़म भी झिलमिलाता है हमारे दौर-ए-महकूमी की मुद्दत घटती जाती है ग़ुलामी के ज़माने में इज़ाफ़ा होता जाता है यही अंदाज़ गर बाक़ी हैं अपनी सुस्त-गामी के न जाने और कितने साल आएँगे ग़ुलामी के
Ali Sardar Jafri
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ग़ुलाम तुम भी थे यारों ग़ुलाम हम भी थे नहा के ख़ून में आई थी फ़स्ले-आज़ादी मज़ा तो तब था कि जब मिल कर इलाज-ए-जां करते ख़ुद अपने हाथ से तामीर-ए-गुलसितां करते हमारे दर्द में तुम और तुम्हारे दर्द में हम शरीक़ होते तो जश्न-ए-आशियां करते तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बर्दोश हम आएँ सुब्ह-ए-बनारस की रौशनी ले कर हिमालय की हवाओं की ताज़गी ले कर और उस के बा'द ये पूछें कौन दुश्मन है ?
Ali Sardar Jafri
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उठो हिन्द के बाग़बानो उठो उठो इंक़िलाबी जवानो उठो किसानों उठो काम-गारो उठो नई ज़िंदगी के शरारो उठो उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से उठो मालवे और मेवात से महाराष्ट्र और गुजरात से अवध के चमन से चहकते उठो गुलों की तरह से महकते उठो उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब उठो जैसे दरिया में उठती है मौज उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए कड़कते गरजते बरसते हुए ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो
Ali Sardar Jafri
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