nazmKuch Alfaaz

कोई आगे न पीछे बहुत दूर तक एक लंबी सड़क दरमियाँ में कोई साया चेहरा-ब-कफ़ गोया तस्वीर तजरीद माहौल का कैनवस बेहद-ओ-बे-कराँ इस पे बुझता हुआ रात का कोएला आग का राज़-दाँ सारे पस-मंज़रों को समेटे हुए जो दिखाई नहीं दे रहा वो धुआँ और सड़क जिस का कोई सिरा ही नहीं चल रहा हूँ बहुत मुद्दतों से यूँँही कोई आगे न पीछे बहुत दूर तक

Related Nazm

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

52 likes

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

42 likes

ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

37 likes

More from Faisal Azeem

लिबास जल कर मिरे बदन पर चिपक गया है बदन मुसलसल सुलग रहा है कहीं कहीं भूले भटके शो'ले उठा के लौ सर की अब भी बाहर को झूलते हैं जिन्हें मैं अपनी जली हथेली की पुश्त से ख़ुद दबा रहा हूँ अलाव से बाहर आ के दहशत-ज़दा निगाहों से देखता हूँ कहीं से अब ऐम्बुलेंस आएगी मेरी जानिब कोई मसीहा-नफ़स सँभालेगा आगे बढ़ कर मगर यहाँ तो कोई मसीहा-नफ़स नहीं है मैं चीख़ता हूँ कोई तो होगा कोई तो बे-इख़्तियार मेरी तरफ़ भी आए बदन से चिमटी क़बा को ख़ुद ही बची खुची उँगलियों की पोरों स छू के महसूस कर रहा हूँ कि जिस्म है या जला हुआ पैरहन है मेरा जो मेरी मिट्टी में धँस रहा है अज़िय्यतों की गवाही देता है ख़लिया ख़लिया जकड़ चुका हूँ मैं इस की परतों में चाहता हूँ कि खींच डालूँ उतार फेंकूँ इसे मगर अब इसे उतारूँ तो खाल मेरी ही खींच लेगा और इन सुलगती बची खुची उँगलियों की पोरों से नाख़ुनों से कुरेदना भी नहीं है बस में जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा क़फ़स है जो पैरहन था वो पैरहन अब मिरा बदन है

Faisal Azeem

0 likes

सख़्त सफ़्फ़ाक ख़ुद में सिमट कर चटख़ती हुई बर्फ़ और मुंजमिद जिस्म-ओ-जाँ रात जज़्बों की क़ब्रों पे कत्बे के मानिंद अटकी हुई हाथ खुर्चे हुए साँस उखड़ी हुई लफ़्ज़ गोया समाअ'त के पर्दे से टकरा के चिपके हुए बर्फ़ पर चार-ओ-नाचार पैरों की जमती हुई उँगलियाँ हड्डियों की दराड़ों में घुसती हवा ख़ून तक राह पाने की कोशिश में टूटी फ़सीलों पे यलग़ार करती हुई दिल बक़ा के लिए ख़ुद से लड़ता हुआ ख़ून पीता हुआ और उगलता हुआ कैसा बोहरान है दम निकलता नहीं सर्द मौसम किसी तौर टलता नहीं जिस क़दर हो सके गिरते पेड़ों की शाख़ें जलाते रहो आग बुझने न दो

Faisal Azeem

0 likes

एक दीवार और उस पर वो मिरे नक़्श-ओ-निगार मेरी दीवार पे दावा सो ये दावा कैसा एक दीवार पे दीवार के रंगों पे कहाँ ख़त्म ये बात एक पिचकारी की हैं मार ये सब नक़्श-ओ-निगार जाओ जाने दो इसे और खुरच ले जाए नक़्श क्या है मिरे हाथों का तहर्रुक है बस रंग क्या हैं मिरे हाथों में दबी पिचकारी शहर क्या है मिरी आँखों में बसी दीवारें रंग मेरे हैं लकीरें हैं मिरी मेरे क़लम रंग दूँगा मैं ज़रा देर में ये शहर तमाम नक़्श कर दूँगा निगाहों पे ये रंगों का फ़ुसूँ और रौज़न नज़र आएँगी सभी दीवारें एक दीवार पे दा'वा सो ये दा'वा कैसा

Faisal Azeem

0 likes

पीने वाले दहन लब-ए-दरिया प्यास बुझने के मंज़रों का फ़िशार सुर्ख़ होंटों से वो टपकता लहू पपड़ियाँ जा-ब-जा चटख़ती हैं ख़ुश्क होंटों में गड़े जाते हैं ख़ार और इधर होंट जो नमी से दो-चार

Faisal Azeem

0 likes

माह-ए-कामिल हैरत की तस्वीर हो जैसे हद्द-ए-चाह-ए-नख़शब आलमगीर हो जैसे होली के रंगों का धोका चेहरों पर तहरीर हो जैसे भीगी रात में आब-ए-शर-अंगेज़ के मारे मस्त सितारे अपनी चालें चूक रहे हैं दहलीज़ों पर पिघली शमएँ नीले बादल के पर्दे में ओझल होते आँख के तारे ढूँड रही हैं आईनों से नालाँ नक़्श से आरी चेहरे जज़्बों के उक़्दों में उलझे मूर्तियों की माला जपते कान में हल्क़े डाले गेरवे बादल पहने नाच रहे हैं लाल तिलक में आँख उगाए शमएँ था में चोब उठाए यक-रंगी दस्तारें जुब्बे गुम्बद ओढ़े सदियों की दीवार पे रोते रक़्स-ए-वहशत का ज़हराब उंडेल रहे हैं ना-बीनाई के पैग़म्बर रंग रचाती मौत की बोली बोल रहे हैं चीख़ रहे हैं इन के पैराहन को देखो चेहरे देखो आँखें देखो देखो सब हाथों को देखो जिस पर रंग नज़र आ जाए जान से जाए लेकिन इन को कौन बताए सब के हाथ रंगे हैं सब के दामन तर हैं आँखें ख़ूनीं हैं चेहरों पर ख़ौफ़ लिखा है लेकिन बे-नूरी में सब तहरीरें आँखों से ओझल हैं राह-ए-अदम पर नक़्श क़दम के ढूँडने वाला सायों की बोहतात में सहमा दहशत की हर ताल पे रक़्साँ सोच रहा है वक़्त के पैरों को दलदल से कौन निकाले शब की ओट से जलता सूरज अपने सर पर कौन उठाए रंगों की बौछार में जाने किस चेहरे पर किस को रंग नज़र आ जाए देव का साया अगले पल किस को खा जाए क्या मा'लूम कि अपनी बारी कब आ जाए

Faisal Azeem

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Faisal Azeem.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Faisal Azeem's nazm.