nazmKuch Alfaaz

"ज़िन्दगी" ज़िंदगी जैसे कि सहराओं में बैठी लड़की ज़िंदगी जैसे कि अख़्नोख़ की लिक्खी चिट्ठी ज़िंदगी जैसे कोई सहन-ए-सुलैमानी है ज़िंदगी बस तेरी यादों की फ़रावानी है ज़िंदगी ख़ुद के तमाशे का तमाशाई है ज़िंदगी आँख के परदे पे उतर आई है किसलिए तोहमतें बाँधूँ की ये रा'नाई है ज़िंदगी है तो मेरी जान में जान आई है ज़िंदगी है किसी भूखे पे निवाले रखना ज़िंदगी दिल के उजाले को सँभाले रखना ज़िंदगी बस किसी वादे से मुकर जाना है ज़िंदगी चुपके से गलियों से गुज़र जाना है ज़िंदगी चाँदनी की हल्की सी बीनाई में ज़िंदगी मौसमों की आलसी अँगड़ाई में ज़िंदगी शोर दबाती हुई शहनाई में ज़िंदगी ख़ुद में दबे ख़ौफ़ व रुसवाई में ज़िंदगी घर से निकलती हुई परछाई में चुपके चुपके तुझे आवाज़ लगाते रहना ज़िंदगी या तो तेरे पीछे ही आते रहना ज़िंदगी बस तेरी ज़ुल्फ़ों को सजाते रहना ज़िंदगी ज़ुल्फ़ों के साए में टहलना फिरना पेच-ओ-ख़म से भरी लहरों में उभरना गिरना फिर इन्हें ग़ैर निगाहों से हटाके रखना या'नी सायों को भी साए से बचा के रखना ज़िंदगी है किसी हीरे को छुपाके रखना ज़िंदगी अशरफ़-ओ-अलज़ाफ़ की जागीर नहीं ज़िंदगी सिर्फ़ गुलाबों की तसावीर नहीं ज़िंदगी ख़ुद की ग़ज़ल ख़ुद से रक़म करती ज़िंदगी शा'इरी है पर सुख़न-ए-मीर नहीं ज़िंदगी एक खुला तीर है शमशीर नहीं ज़िंदगी नज़्म है पर ताक़त-ए-तहरीर नहीं ज़िंदगी गीत है और गीत को गाते रहना लम्हा दर लम्हा इसे फ़न में गँवाते रहना ज़िंदगी फल है जिसे रोज़ पकाते रहना ज़िंदगी आप में रंगीन अदाकारी है ज़िंदगी मौत से बस लड़ने की बीमारी है

Related Nazm

"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

25 likes

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

25 likes

"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

236 likes

"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

216 likes

More from Adnan Ali SHAGAF

"मु'आइना" आज बैठा नहीं है कोई उस के दर पे, जनाब! आज मौजूद है ही नहीं क्या कोई उस के घर पे, जनाब? छत की रेलिंग पे हैं कुछ तो कपड़े पड़े गो हों महबूब के पर वहाँ पर भी मौजूदगी का नहीं कुछ गुमाँ होगी शायद वो कमरे में लेटे पड़े बिस्तरे पर ही आराम से इक अजब सी ख़मोशी भरी ये फ़ज़ा और रंगत बदलता हुआ आसमाँ मुझ को मालूम है ये है उस की ख़ता उस ने सूरज से पर्दा किया कहने को इक ज़रा भी नहीं चल रही है हवा और कपड़े वहीं के वहीं पर हैं लटके हुए जैसे मेरे मुक़द्दर का ताला है लटका हुआ और अफ़सुर्दगी को फ़ज़ा में बिखेरे ये सूरज भी ढल ही गया सर के ऊपर गुज़रते अचानक कोई पंछी चहकाई है छत पे देखा तो मुमकिन है वो ही नज़र आई हो और इसी वसवसे में बहुत धीरे-धीरे से इस तीरगी के वजह से मेरे आँखों से अब बिछड़ती ये बीनाई है दो ही इमकान हैं छत पे वो आई हो या वही आई हो फिर भी ऐन-ए-यक़ीं से उसे अब तलक मैं ने देखा नहीं क्या अजब है कि मग़रिब है और वो अभी तक है सोई हुई सब्र करना है तो सब्र ही करता हूँ अब मैं चलता हूँ मरने कि उठकर फिर उस के लिए मर सकूँ अब मैं चलता हूँ उस पर सलामुन 'अलैक

Adnan Ali SHAGAF

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Adnan Ali SHAGAF.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Adnan Ali SHAGAF's nazm.