nazmKuch Alfaaz

"मु'आइना" आज बैठा नहीं है कोई उस के दर पे, जनाब! आज मौजूद है ही नहीं क्या कोई उस के घर पे, जनाब? छत की रेलिंग पे हैं कुछ तो कपड़े पड़े गो हों महबूब के पर वहाँ पर भी मौजूदगी का नहीं कुछ गुमाँ होगी शायद वो कमरे में लेटे पड़े बिस्तरे पर ही आराम से इक अजब सी ख़मोशी भरी ये फ़ज़ा और रंगत बदलता हुआ आसमाँ मुझ को मालूम है ये है उस की ख़ता उस ने सूरज से पर्दा किया कहने को इक ज़रा भी नहीं चल रही है हवा और कपड़े वहीं के वहीं पर हैं लटके हुए जैसे मेरे मुक़द्दर का ताला है लटका हुआ और अफ़सुर्दगी को फ़ज़ा में बिखेरे ये सूरज भी ढल ही गया सर के ऊपर गुज़रते अचानक कोई पंछी चहकाई है छत पे देखा तो मुमकिन है वो ही नज़र आई हो और इसी वसवसे में बहुत धीरे-धीरे से इस तीरगी के वजह से मेरे आँखों से अब बिछड़ती ये बीनाई है दो ही इमकान हैं छत पे वो आई हो या वही आई हो फिर भी ऐन-ए-यक़ीं से उसे अब तलक मैं ने देखा नहीं क्या अजब है कि मग़रिब है और वो अभी तक है सोई हुई सब्र करना है तो सब्र ही करता हूँ अब मैं चलता हूँ मरने कि उठकर फिर उस के लिए मर सकूँ अब मैं चलता हूँ उस पर सलामुन 'अलैक

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"ज़िन्दगी" ज़िंदगी जैसे कि सहराओं में बैठी लड़की ज़िंदगी जैसे कि अख़्नोख़ की लिक्खी चिट्ठी ज़िंदगी जैसे कोई सहन-ए-सुलैमानी है ज़िंदगी बस तेरी यादों की फ़रावानी है ज़िंदगी ख़ुद के तमाशे का तमाशाई है ज़िंदगी आँख के परदे पे उतर आई है किसलिए तोहमतें बाँधूँ की ये रा'नाई है ज़िंदगी है तो मेरी जान में जान आई है ज़िंदगी है किसी भूखे पे निवाले रखना ज़िंदगी दिल के उजाले को सँभाले रखना ज़िंदगी बस किसी वादे से मुकर जाना है ज़िंदगी चुपके से गलियों से गुज़र जाना है ज़िंदगी चाँदनी की हल्की सी बीनाई में ज़िंदगी मौसमों की आलसी अँगड़ाई में ज़िंदगी शोर दबाती हुई शहनाई में ज़िंदगी ख़ुद में दबे ख़ौफ़ व रुसवाई में ज़िंदगी घर से निकलती हुई परछाई में चुपके चुपके तुझे आवाज़ लगाते रहना ज़िंदगी या तो तेरे पीछे ही आते रहना ज़िंदगी बस तेरी ज़ुल्फ़ों को सजाते रहना ज़िंदगी ज़ुल्फ़ों के साए में टहलना फिरना पेच-ओ-ख़म से भरी लहरों में उभरना गिरना फिर इन्हें ग़ैर निगाहों से हटाके रखना या'नी सायों को भी साए से बचा के रखना ज़िंदगी है किसी हीरे को छुपाके रखना ज़िंदगी अशरफ़-ओ-अलज़ाफ़ की जागीर नहीं ज़िंदगी सिर्फ़ गुलाबों की तसावीर नहीं ज़िंदगी ख़ुद की ग़ज़ल ख़ुद से रक़म करती ज़िंदगी शा'इरी है पर सुख़न-ए-मीर नहीं ज़िंदगी एक खुला तीर है शमशीर नहीं ज़िंदगी नज़्म है पर ताक़त-ए-तहरीर नहीं ज़िंदगी गीत है और गीत को गाते रहना लम्हा दर लम्हा इसे फ़न में गँवाते रहना ज़िंदगी फल है जिसे रोज़ पकाते रहना ज़िंदगी आप में रंगीन अदाकारी है ज़िंदगी मौत से बस लड़ने की बीमारी है

Adnan Ali SHAGAF

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