आ जाओ किसी सम्त से दो पल के लिए ही बीमार को कुछ देर की राहत भी बहुत है
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया
Tehzeeb Hafi
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शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई लेकिन यक़ीन सब को दिलाता रहा हूँ मैं
Jaun Elia
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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हिज्र मुश्किल से भी मुश्किल न कहीं हो जाए तुम शब-ए-वस्ल कोई ऐसी नवाज़िश न करो
Saqlain Mushtaque
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ग़म-ए-हिज्र से मैं हूँ आशना मुझे आरज़ू-ए-विसाल है ये इलाज और ये मुआलिजा मेरे दर्द कि तो दवा नहीं
Saqlain Mushtaque
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ना-ख़ुदा डर नहीं दरिया की रवानी का हमें हर तलातुम से निकलने का हुनर जानते हैं
Saqlain Mushtaque
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न था कोई तसव्वुर में तो जीने की न थी ख़्वाहिश मगर अब ज़िंदगी तुझ सेे जुदा होने से डरता हूँ
Saqlain Mushtaque
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कुछ तो मुश्ताक़ शब-ए-हिज्र में राहत होगी जाते-जाते कोई तस्वीर पुरानी दे दे
Saqlain Mushtaque
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