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आदमी जैसी किसी शय से मुलाक़ात हुई कल मेरी ख़ुद से बड़ी देर तलक बात हुई दिन यूँँ ही क़ैद रहा उस की ज़री ज़ुल्फ़ों में उस ने जब खोल दी ज़ुल्फ़ें तो कहीं रात हुई

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उस के पहलू में रात होती है बात करने पे बात होती है वैसे टाइम का कुछ पता तो नहीं हाँ मगर पौने सात होती है

Ankit Yadav

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कितने सावन बरसा करते उस के जानिब लेकिन अपनी ज़िद में प्यासा जंगल प्यासा ही रहता है

Ankit Yadav

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मोहब्बत में महारत है हमें बस की नहीं है हसीं चेहरा खुली ज़ुल्फ़ें लटें बस की नहीं है अभी करनी है तो कर ले मोहब्बत कम या ज़्यादा मुझे मालूम है तू बा'द में बस की नहीं है

Ankit Yadav

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शहर-ए-मशहूर जा रहा है कोई हो के मजबूर जा रहा है कोई खिड़कियाँ पास आती जा रही हैं या'नी अब दूर जा रहा है कोई

Ankit Yadav

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तेरा ख़ामोश हो जाना बड़ा महसूस होता था मैं तुझ सेे क्या कहूँ अब और क्या महसूस होता था मेरा भी तेरे पहलू से ज़रा उकता गया था दिल तुझे भी दरमियाँ ये फ़ासला महसूस होता था

Ankit Yadav

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