आंचल मिरा ख़ाली रहा बरसात की उम्मीद में वो मुझ से पर्दा कर के क्यूँ शब भर भला रोता रहा
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जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
Shabeena Adeeb
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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ज़िंदगी से ज़िंदगी जब रूठ जाएगी सनम ख़्वाब पाने के मुझे तुम देखना फिर सौ जनम रात को हँसते मिलोगे नींद में बेफ़िक्र तुम और उठते ही सवेरे फिर करोगे आँख नम
Rubball
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ख़ुदा है संग मेरे हाथ था में हर घड़ी जैसे ज़माने पर ज़फ़र होना मुझे आसान लगता है
Rubball
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हाथ अपनों के थे शामिल लूटने में घर मिरा जाँच रो के कर रहे हैं कुछ नहीं रह तो गया
Rubball
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बे-शक्ल वो सब हाथ थे जो नोचते थे जिस्म को मशहूर चेहरा वो हुआ जिस की गई थी आबरू
Rubball
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आज सारे शोर दिल के ख़्वार हैं चुप-चाप हैं एक मुद्दत बा'द सीने से लगे यूँँ आप हैं
Rubball
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