अब सिफ़्र-ए-संग-ए-मील है हद्द-ए-निगाह में आने को है जो साल नया अगले माह में
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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ज़िक्र बादल का भी होना चाहिए सिर्फ़ सावन का यहाँ चर्चा हुआ
Javed Aslam
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उसी से प्यार है जिस से हमें नाराज़गी भी है जहाँ पर बैर होता है वहीं वाबस्तगी भी है
Javed Aslam
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वो मुहब्बत के इवज़ जान भी दे देते हैं रस्म सदियों से यही आम है परवानों में
Javed Aslam
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रेलगाड़ी है ये जहाँ अपना मंज़िलें अपनी अपने सामाँ हैं हम सफ़र थे जो एक दो पल के मेरे दिल के वो ख़ास मेहमाँ हैं
Javed Aslam
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चंद लम्हों की शाम जैसे थे जा के आना भी सीख लेते तुम
Javed Aslam
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