अफ़लाक से आगे न निकल जाएँ तसव्वुर महदूद ज़मीं तक ही ख़यालों को रखें आप
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
Nida Fazli
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
Shahryar
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उन की आँखें झील हैं तो क्या करें डूब जाएँ काम धंधा छोड़ दें?
Saurabh Sharma 'sadaf'
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दबी कुचली हुई सब ख़्वाहिशों के सर निकल आए ज़रा पैसा हुआ तो च्यूँँटियों के पर निकल आए अभी उड़ते नहीं तो फ़ाख़्ता के साथ हैं बच्चे अकेला छोड़ देंगे माँ को जिस दिन पर निकल आए
Mehshar Afridi
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एक फ़न है बिखर जाना और मैं उस्ताद हूँ इस में
Abdulla Asif
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रो रो के कह रही है धनक धिन धनक धनक इक साज़ तेरे लम्स से जो आश्ना नहीं
Abdulla Asif
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क़ीमत मुकर्रर है तिरी हम तो मुनासिब दाम हैं
Abdulla Asif
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हैरान भी बहुत हैं परेशान भी बहुत यूँँ लग रहा है जैसे हैं अहल-ए-ग़दीर हम ये राज़ खुलने वाला है दुनिया पे जल्द ही साकित है वक़्त और हैं हरकत-पज़ीर हम
Abdulla Asif
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उदासियों के समुंदर में डूब जाता मैं जो कहकहा न लगाता तो और क्या करता
Abdulla Asif
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