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'अल्वी' ये मो'जिज़ा है दिसम्बर की धूप का सारे मकान शहर के धोए हुए से हैं

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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

Nida Fazli

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ख़ुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना ये सारे खेल हैं, इन में उदास मत होना

Kumar Vishwas

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धूप पड़े उस पर तो तुम बादल बन जाना अब वो मिलने आए तो उस को घर ठहराना। तुम को दूर से देखते देखते गुज़र रही है मर जाना पर किसी गरीब के काम न आना।

Tehzeeb Hafi

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ख़ाली पड़ा है और उदासी भरा है दिल सो लोग इस मकान से आगे निकल गए

Ankit Maurya

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छोड़ो दुनिया की परवाहें, करो मोहब्बत मुश्किल हों कितनी भी राहें, करो मोहब्बत सुन कर देखो सारे मंदिर यही कहेंगे यही कहेंगी सब दरगाहें, करो मोहब्बत

Bhaskar Shukla

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