दिल-ए-नादाँ को अक़्ल दे रहा हूँ मय को मरहम की शक़्ल दे रहा हूँ जो मोहब्बत पनप रही मुझ में उसे नफ़रत की शक़्ल दे रहा हूँ
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बिठा दिया है सिपाही के दिल में डर उस ने तलाशी दी है दुपट्टा उतार कर उस ने मैं इस लिए भी उसे ख़ुद-कुशी से रोकता हूँ लिखा हुआ है मेरा नाम जिस्म पर उस ने
Zia Mazkoor
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वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है
Umair Najmi
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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मैं चाहता हूँ मोहब्बत मेरा वो हाल करे कि ख़्वाब में भी दोबारा कभी मजाल न हो
Jawwad Sheikh
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तुम्हारे ग़म को मगर ओढ़े रक्खा तीनों दिन मैं चाहता तो मना सकता था तेरे बिन ईद
Faiz Ahmad
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उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
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तिरे जाने का मिरा गैज़ कम नहीं हो रहा कि गुनाह कर के भी कोई ग़म नहीं हो रहा
Faiz Ahmad
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जश्न-ए-मक़तल को मिरे शाम मनाते तो सही तुम चराग़ों को हवाओं में जलाते तो सही पा-ब-जौलाँ ही सही दौड़ के आता मैं तो अपने जानिब मुझे इक बार बुलाते तो सही
Faiz Ahmad
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जो दोस्तों से भी छुपाया मैं ने तुम वो राज़ थी हमें तो बे-वफा़ई भी सिखाई, तेरे इश्क़ ने तुम्हें ख़याल में भी जब छुआ तो बा-वुजू़ छुआ शराबी को सिखाई पारसाई, तेरे इश्क़ ने
Faiz Ahmad
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