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एक बरस अब पूरा होने वाला है पिछले साल इसी मौसम में बिछड़े थे

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जिस को समझा था रौशनी-ए-क़मर शख़्स ऐसा वो आबगीना था उस सेे बिछड़े थे सर्द मौसम में साल का पहला ही महीना था

Puneet Mishra Akshat

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नए बरस से मुहब्बत नहीं करेंगे हम किसी से इश्क़ में ये आख़िरी दिसंबर है

Puneet Mishra Akshat

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ज़ख़्म हम दिल के दिखाएँ तो दिखाएँ कैसे हो गई है जो ख़ता उस को छिपाएँ कैसे मुफ़लिसी देख मेरी जिस ने भुलाया मुझ को ऐसे इन्साँ को वफा़दार बताएँ कैसे

Puneet Mishra Akshat

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तुम्हारे ख़्वाब बिछड़े आ रहे हैं हमें ये बारहा तड़पा रहे हैं वहाँ पर तुम किसी से मिल रहे हो यहाँ सिगरट जलाए जा रहे हैं

Puneet Mishra Akshat

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किसी की चंद रातों का सुधाकर हो नहीं पाया तुम्हारी उर्मियों का मैं, उर-अंतर हो नहीं पाया सरल थीं मन की प्रतिमाएं, मगर अफ़सोस है इतना मैं सब कुछ था तेरा, मेहंदी महावर हो नहीं पाया

Puneet Mishra Akshat

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