हम अपना महल ढूँढ़ते फिरते है दर-ब-दर फ़क़ीरों की मानिंद ठाए बुढ़ापे का जिस्म
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या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ
Kushal Dauneria
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इश्क़ करना इक सज़ा है क्या करें इश्क़ का अपना मज़ा है क्या करें
Syed Naved Imam
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जो अपना हिस्सा भी औरों में बाँट देता है इक ऐसे शख़्स के हिस्से में आ गए थे हम
Ismail Raaz
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अमीर इमाम के अश'आर अपनी पलकों पर तमाम हिज्र के मारे उठाए फिरते हैं
Ameer Imam
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और क्या चाहती है गर्दिश-ए-अय्याम कि हम अपना घर भूल गए उन की गली भूल गए
Jaun Elia
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न मेरा है न किसी और के बाप का सूरज है इन दिनों तो बुलंदी पे आप का सूरज गुज़र रही है शब ए ग़म इस आस में तन्हा के एक दिन तो उगेगा मिलाप का सूरज
Amaan mirza
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ये आज कल नए लौंडे हमारे शे'रों में कमी टटोलते हैं उस पे काम करते नहीं
Amaan mirza
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नहीं आसान इंसाँ हो के हर इक की ख़बर रखना बहुत सारे तअल्लुक़ टूट जाते हैं तग़ाफुल में
Amaan mirza
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मुशायरे का ये भी इक उसूल होना था कम अज़ कम आज का दिन तो फिज़ूल होना था जिस इत्मीनान से मैं ने तुम्हें सुना है दोस्त बस उतना वक़्त मुझे भी वसूल होना था
Amaan mirza
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तुम्हारे साथ में जो गुज़री थी वो ज़िंदगी थी तुम्हारे बा'द ये क्या ज़िंदगी है? बिल्कुल नइँ ख़मोश रहने की आदत सी हो गई है मुझे भला ख़मोशी कभी बोलती है? बिल्कुल नइँ
Amaan mirza
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