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नहीं आसान इंसाँ हो के हर इक की ख़बर रखना बहुत सारे तअल्लुक़ टूट जाते हैं तग़ाफुल में

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न मेरा है न किसी और के बाप का सूरज है इन दिनों तो बुलंदी पे आप का सूरज गुज़र रही है शब ए ग़म इस आस में तन्हा के एक दिन तो उगेगा मिलाप का सूरज

Amaan mirza

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मुशायरे का ये भी इक उसूल होना था कम अज़ कम आज का दिन तो फिज़ूल होना था जिस इत्मीनान से मैं ने तुम्हें सुना है दोस्त बस उतना वक़्त मुझे भी वसूल होना था

Amaan mirza

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मीर के ऊला से ग़ालिब का सानी जोड़ दिया बोला ये शे'र सुनो दाद चाहिए मुझ को कोई भी दर्द या फिर ज़ख़्म अता करो यारों शा'इरी के लिए इमदाद चाहिए मुझ को

Amaan mirza

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मैं क्या बताऊँ तुम को अपना हाल बेहद बुरा गुज़रा पुराना साल कहता हूँ अपने तजरिबे से सुन कम अक़लों की यारी जी का जंजाल

Amaan mirza

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हम अपना महल ढूँढ़ते फिरते है दर-ब-दर फ़क़ीरों की मानिंद ठाए बुढ़ापे का जिस्म

Amaan mirza

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