हम अपने हाल-ए-परेशाँ पे बारहा रोए और उस के बा'द हँसी हम को बारहा आई
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मुद्दतों बा'द इक शख़्स से मिलने के लिए आइना देखा गया, बाल सँवारे गए
Jaun Elia
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अब इन जले हुए जिस्मों पे ख़ुद ही साया करो तुम्हें कहा था बता कर क़रीब आया करो मैं उस के बा'द महिनों उदास रहता हूँ मज़ाक में भी मुझे हाथ मत लगाया करो
Tehzeeb Hafi
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बड़े नादान हो तुम भी ज़रा समझा करो बातें गले मिल कर जो रोती है बिछड़ कर कितना रोएगी
Ankita Singh
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और फिर एक दिन बैठे बैठे मुझे अपनी दुनिया बुरी लग गई जिस को आबाद करते हुए मेरे मां-बाप की ज़िंदगी लग गई
Tehzeeb Hafi
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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
Mirza Ghalib
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किस ने देखे हैं तिरी रूह के रिसते हुए ज़ख़्म कौन उतरा है तिरे क़ल्ब की गहराई में
Rais Amrohvi
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और बढ़ जाती है कुछ लफ़्ज़-ओ-बयाँ की तासीर लफ़्ज़ जब अश्क की सूरत में अदा होता है
Rais Amrohvi
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टहनी पे ख़मोश इक परिंदा माज़ी के उलट रहा है दफ़्तर
Rais Amrohvi
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पहले ये शुक्र कि हम हद्द-ए-अदब से न बढ़े अब ये शिकवा कि शराफ़त ने कहीं का न रखा
Rais Amrohvi
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ख़ामोश ज़िन्दगी जो बसर कर रहे हैं हम गहरे समुंदरों में सफ़र कर रहे हैं हम
Rais Amrohvi
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