होने दो तसल्ली से अभी ये गुफ़्तगू जाने कब हो ऐसे ज़िन्दगी फिर रू-ब-रू
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सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
Allama Iqbal
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फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था
Adeem Hashmi
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
Meer Taqi Meer
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निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते हमीं उन से उमीदें आसमाँ छूने की करते हैं हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते
Waseem Barelvi
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न जाने क्यूँँ गले से लगने की हिम्मत नहीं होती न जाने क्यूँँ पिता के सामने बेटे नहीं खुलते
Kushal Dauneria
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उन्हें खो कर ये माना हम सिफ़र हैं मुयस्सर पर उन्हें भी हम कहाँ हैं
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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मुसन्निफ़ हूँ मगर किरदार होता जा रहा हूँ तसल्लुत अपने ही लिक्खे पे खोता जा रहा हूँ कहानी में तो इक अंजाम अच्छा ही लिखा था उसी अंजाम पर पैहम मैं रोता जा रहा हूँ
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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निकलते हैं कफ़न बांधे फ़ना होने की निय्यत से के संग एक ही उछालेंगे मगर अब के तबीअत से
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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कौन छेड़े फिर वही क़िस्सा पुराना आतिशों का काम है जलना जलाना
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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करवट-करवट घूँट-घूँट भर, स्याह रात गुज़री ऐसे नींद किसी ने तह कर के, अलमारी में रख दी जैसे
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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