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इक शहज़ादी ने दी है इक माँ को उतरन इक बच्ची को मिल जाएँगे नए कपड़े आज

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इस क़दर दिल सहे ज़द ठीक नहीं इश्क़ की इतनी भी हद ठीक नहीं बंद कमरे से निकल आ बाहर दर्द की इतनी मदद ठीक नहीं

Nakul kumar

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लोग तो बस जिस्मों पर बनवाते फिरते हैं लेकिन तेरे   नाम  का  टैटू  मैं ने  दिल  पर  बनवाया  था

Nakul kumar

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शदीद उलझनें सब ख़्वाहिशें जला रही हैं अजीब हाल है मेरा समझ नहीं आता यूँँ ज़िंदा रहना भी क्या कोई बेवक़ूफ़ी है या कोई कमाल है मेरा समझ नहीं आता

Nakul kumar

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मैं चाहता हूँ कि आँसू लूँ कुछ निकाल तिरे तिरी नज़र में छुपे हैं सभी सवाल तिरे

Nakul kumar

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पहले याद आती हैं तो रोती हैं आँखें फिर कहीं जा कर ज़रा सोती हैं आँखें हर नज़र में क़ैद हैं मंज़र कई से ख़्वाबों की लाशें फ़क़त ढोती हैं आँखें

Nakul kumar

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