जहाँ पर था बसा मेरा मकाँ तन्हा मैं बेहतर से भी बेहतर था वहाँ तन्हा
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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख
Allama Iqbal
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे तू देख कि क्या रंग है तेरा, मेरे आगे
Mirza Ghalib
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तसव्वुर था उसे ख़ुद की मुकम्मल सी ग़ज़ल कहता नदामत है कि वो दुल्हन किसी की बन चुकी होगी
Rovej sheikh
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तुम को हम से उलझन कौन हो तुम इश्क़ के जानी दुश्मन कौन हो तुम जिस को दिया था कंगन तुम वो नहीं लौटा रही हो कंगन कौन हो तुम
Rovej sheikh
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तन्हा कमरे में सदा बैठ के रोने का मज़ा हम ग़रीबों के सिवा कौन समझ सकता है
Rovej sheikh
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माथे से उस की आँख तक पहुँचा ही था घबरा के उस ने कह दिया अब यार बस
Rovej sheikh
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ये तू किस दुश्मनी की दिल में कसक लाया है ज़ख़्म भरने के लिए यार नमक लाया है
Rovej sheikh
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