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कम हो गईं ख़्वाबों से बातें आज कल शायद मिरे अंदर का मैं ही मर गया

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निगाहों के सागरों से पानी छलक न जाए कहीं हमारा अज़ाब-ए-दिल पे न रोने का टूट ये न जाए यक़ीं हमारा तो शोख़ी तो देखो उन की वो बस हमारे ही वास्ते हैं ऐसे वो चारा-गर बन गए हैं अब पर इलाज करते नहीं हमारा

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वो पड़े इस बात पे हम सेे उलझ के आज दिन में आपने कैसे तो कैसे सुब्ह दूजा चाँद देखा

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ये दिल है तेरा या मेरा ख़याल कुछ भी नहीं ये शाम है या सवेरा ख़याल कुछ भी नहीं याँ इक मैं हूँ जिस को तेरा ही है ख़याल फ़क़त वाँ इक तू है जिस को मेरा ख़याल कुछ भी नहीं

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मेरे ज़ख़्म चीख़ के बताते हाल हैं उन्हें अपने कान से नहीं जो अपने दिल से बहरे हैं खोल देता हूँ मैं उन के आगे अपने सारे राज पर उन्हें तो लगता हैं ये सारे मेरे चेहरे हैं

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हम तो वो हैं कोई हम को चाहता ही है नहीं चाहते भी हम यही है कोई हम को चाहे ही न

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