किसी की याद तारी हो रही है मेरी आवाज़ भारी हो रही है
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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रातें किसी याद में कटती हैं और दिन दफ़्तर खा जाता है दिल जीने पर माएल होता है तो मौत का डर खा जाता है सच पूछो तो 'तहज़ीब हाफ़ी' मैं ऐसे दोस्त से आज़िज़ हूँ मिलता है तो बात नहीं करता और फोन पे सर खा जाता है
Tehzeeb Hafi
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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अब उस की शादी का क़िस्सा न छेड़ो बस इतना कह दो कैसी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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सब्र आने की देर है वरना तू भी दिल से उतर ही जाएगा
Wajid Husain Sahil
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ख़िरद ने दी जो दबिश मेरे दफ़्तरे-दिल पर तेरा ख़याल मिला है मेरे ठिकानों से
Wajid Husain Sahil
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पहले तकता रहा खिड़की से वो ख़ामोशी से और फिर कार की रफ़्तार बढ़ा दी उस ने
Wajid Husain Sahil
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कोई इतना किसी के वास्ते क्यूँ ख़ास होता है बिछड़ जाता है जब वो शख़्स तो एहसास होता है
Wajid Husain Sahil
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मेरी आमद से भला क्यूँ आइने डरने लगे मेरे हाथों में तो साहिल कोई पत्थर भी नहीं
Wajid Husain Sahil
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