क्यूँ मिरे फूल से चेहरे यूँँ है मुरझाया सा तुझ सा तो बाग़-ए-जहाँ में कोई दूजा भी नहीं
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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भीगीं पलकें देख कर तू क्यूँँ रुका है ख़ुश हूँ मैं वो तो मेरी आँख में कुछ आ गया है ख़ुश हूँ मैं वो किसी के साथ ख़ुश था कितने दुख की बात थी अब मेरे पहलू में आ कर रो रहा है ख़ुश हूँ मैं
Zubair Ali Tabish
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जौन' उठता है यूँँ कहो या'नी 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' का यार उठता है
Jaun Elia
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ये मुहब्बत की किताबें कौन यूँँ कब तक पढ़े कौन मारे रोज़ ही इक बात पे अपना ही मन
nakul kumar
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पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
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हमारा प्यार यूँँ ही पाएमाल होता रहा हर इक सवाल के बदले सवाल होता रहा जहाँँ में जो भी है उस का लिखा हुआ है अगर तो क्या हमारा फ़क़त इस्तिमाल होता रहा
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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तू आदतन चीज़ों को रखता था जगह पर इस लिए कमरे की सब चीज़ों को मैं भी दर-ब-दर करता रहा
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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मिलने के बा'द हर कोई मसरूफ़ हो गया जब तक नहीं मिले थे सभी बे क़रार थे कोई सुख़नवरी थी न कोई हुनर था पास लेकिन हमारे हक़ में तमाम इश्तिहार थे
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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इक तमन्ना अजब शहीद हुई ज़िंदगी मौत की मुरीद हुई एक दो साल तो लगेंगे उसे शा'इरी तू भी तो जदीद हुई
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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गम-ए-दिल सुनाया सभी को ये कह कर किसी को भी ये सब बताना नहीं है
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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