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मैं नहीं मानता जा तिरी बंदगी तू ख़ुदा है अगर सामने आ के मिल

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ये जो मैं हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा बस तुम्हारा ये जो तुम हो जहाँ के हो मगर मेरे नहीं हो

Janib Vishal

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ज़ब्त-ए-औक़ात भी औक़ात में आ जाता है बात उस की हो तो दिल बात में आ जाता है मौसम-ए-गुल भी बहाना है नहीं आने को आने वाला भरी बरसात में आ जाता है

Janib Vishal

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ये बहार-ए-सोग के ग़मनाक मंज़र मिल रहे हैं हम अगर ख़ुश मिल रहे तो ग़म छुपाकर मिल रहे हैं

Janib Vishal

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किसी ने जब गए दिन का पता पूछा लगा ऐसा कि कोई हादिसा पूछा हमीं थे राह भटके लोग हैरत है हमीं से मंज़िलों ने रास्ता पूछा

Janib Vishal

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जो राज़ दिल में है दबा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर मैं ज़िंदगी को भी दगा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर तेरा वो बोसा अब भी मेरी अक़्ल से जाता नहीं हर इक निशां तेरा मिटा दूँगा कफ़न को ओढ़ कर

Janib Vishal

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