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ये जो मैं हूँ तुम्हारा हूँ तुम्हारा बस तुम्हारा ये जो तुम हो जहाँ के हो मगर मेरे नहीं हो

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किसी ने जब गए दिन का पता पूछा लगा ऐसा कि कोई हादिसा पूछा हमीं थे राह भटके लोग हैरत है हमीं से मंज़िलों ने रास्ता पूछा

Janib Vishal

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ज़ब्त-ए-औक़ात भी औक़ात में आ जाता है बात उस की हो तो दिल बात में आ जाता है मौसम-ए-गुल भी बहाना है नहीं आने को आने वाला भरी बरसात में आ जाता है

Janib Vishal

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ये बहार-ए-सोग के ग़मनाक मंज़र मिल रहे हैं हम अगर ख़ुश मिल रहे तो ग़म छुपाकर मिल रहे हैं

Janib Vishal

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वहीं घर फ़ोन से वो प्यार देती है मुझे अपना बिगाड़ा हो गया इतना कि मिलने आ नहीं सकती

Janib Vishal

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हुई है जिस को भी कहता है लानत है मुहब्बत नज़र की नींद से समझो बग़ावत है मुहब्बत अगर पूछे ज़माना इक बला जो ख़ूब-सूरत दबा कर गाल कह देना मुहब्बत है मुहब्बत

Janib Vishal

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